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प्रकृति से मिलते हैं सहिष्णुता के उदाहरण

धर्मसभा में बोले आचार्य देवेन्द्र सागर

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प्रकृति से मिलते हैं सहिष्णुता के उदाहरण

प्रकृति से मिलते हैं सहिष्णुता के उदाहरण

बेंगलूरु. पाश्र्व सुशीलधाम में अपने प्रासंगिक प्रवचन में आचार्य देवेंद्रसागर ने कहा कि कम खाओ, गम खाओ, नम जाओ पहले दो शब्दों ‘कम खाओ’ का अर्थ यह है कि मानव को उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए कम खाना चाहिए। कम खाने से व्यक्ति कमजोर नहीं होता है, वरन दीर्घायु को प्राप्त होता है। दूसरे दो शब्दों ‘गम खाओ’ का अर्थ यह है कि जीवन में कई बार लोग जली-कटी सुना देते हैं व अपने आचरण से दूसरों को दुख देते हैं। इससे मानव को दुख होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चाहिए कि इस गम को पी जाए व भूल जाए। इससे व्यक्ति स्वयं को हल्का महसूस करेगा।
तीसरे शब्द ‘नम जाओ’ का अर्थ यह है कि हमें जीवन में अपने रुख में लचीलापन रखना चाहिए न कि हठीलापन। आपने देखा होगा कि जब आंधी-तूफान आता है तो देवदार के वृक्ष अकडक़र खड़े रहते हैं और उखड़ जाते हैं जबकि नाचीज-सी दिखने वाली घास आंधी-तूफान के बहने की दिशा में झुक जाती है और सही-सलामत बची रहती है। इससे अच्छा ‘नम जाने’ (सहनशीलता) का उदाहरण भला क्या हो सकता है? यह हम प्रकृति से सीख सकते हैं। हम अगर प्रकृति की ओर दृष्टिपात करें तो हमें उसकी सहिष्णुता के कई उदाहरण मिल सकते है। जब शीत ऋतु आती है तो उसका मुकाबला करने वाली खाद्य व पेय सामग्री प्रकृति हमारे लिए प्रस्तुत कर देती है, जैसे पिंड खजूर, अदरक आदि। इसी प्रकार ग्रीष्म ऋतु के दौरान भी हमें मौसम का मुकाबला करने वाली चीजें आम, संतरा, गन्ना व फलों का रस आदि की प्राप्ति सुलभ होती है। यह प्रकृति की उदारता व सहनशीलता का अनुपम उदाहरण है। प्रकृति हमें सब कुछ देती है, पर स्वार्थी मनुष्य इसके मुकाबले में बहुत ही कम लौटाता है। यह प्रवृत्ति उचित नहीं है। आचार्य ने कहा कि हमें भी लेने के बदले में उतना ही देना भी चाहिए ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे।