
जितने बड़े कलाकार, उतने ही बड़े इंसान
संतोष पाण्डेय
साहित्य लेखन, फिल्म, रंगमंचीय अभिनय एवं निर्देशन में अपना लोहा मनवाने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी गिरीश कर्नाड को ढेर सारी फिल्मों में देख चुका था। उनकी असाधारण प्रतिभा और ख्याति से परिचित था। बारह साल पहले एक पुस्तक विमोचन समारोह में पहली बार उनसे मुलाकात हुई थी, जिसकी स्मृति उनके संसार से अलविदा होने पर यकायक मानस पटल पर उभर आई।
उस समारोह में तब थोड़ी सी बातचीत में ही उनकी सहजता ने मोह लिया था। इतने बड़े कलाकार, असाधारण लोकप्रियता, लेकिन कोई ताम झाम नहीं, कोई ठसक नहीं, कोई फ़ौज-फाटा नहीं। सफलता और उपलब्धियों का सुरूर न उनके चेहरे पर था, न बातचीत में और न व्यक्तित्व में। मिले तो ऐसे जैसे वर्षों से जानते हों। बातों-बातों में मोबाइल नंबर भी तुरंत दे दिया...। इस नंबर का उपयोग हुआ स्वतंत्रता दिवस के आसपास। मैंने उन्हें कॉल किया, कॉल रिसीव हुई तो मैंने कहा, आपसे स्वतंत्रता दिवस पर बात करनी है, तो वे बोले-'मैं अभी दिल्ली एयरपोर्ट पर हूं। बात नहीं हो सकती।Ó वे किसी फिल्म की शूटिंग के लिए जा रहे थे। मैंने पूछा कब तक लौटेंगे तो जवाब मिला 10-15 दिन लग जाएंगे। जाहिर है स्वतंत्रता दिवस के परिप्रेक्ष्य में इतने दिन बाद बात करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। मैंने उनसे रात में थोड़ा समय देने का आग्रह किया तो उन्होंने हामी भरी और बात भी हुई। फोन पर चर्चा में उनकी बेबाकी, साफगोई आज भी झकझोरती है, किसी मित्र से गुफ्तगू जैसी।
जब पूछा कि ऐसी कौन सी चीज है जो हर हाल में जिंदा रहनी चाहिए जिसमें वे इस देश का भविष्य देखते हों?
उनका जवाब था-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर हाल में बरकरार रहनी चाहिए। कोई हमला या पाबंदी नहीं होनी चाहिए।
मेरा अगला सवाल था -आजादी की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
कर्नाड बोले-लोकतंत्र की जड़ों का निरंतर गहरा और मजबूत होना आजादी के बाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
...मैं कर्नाड के शब्द लिख रहा था और बार-बार उनसे बात फिर से कहने का अनुरोध कर रहा था! लेकिन, वे न झल्लाए और न लहजे में जरा बदलाव ही आया। आखिरकार उन्होंने कहा कि इतनी विविधताओं और जटिलताओं से भरे हमारे देश में समन्वय व सहअस्तित्व की संस्कृति का रंग दिनोंदिन गाढ़ा हुआ है और यही लोकतंत्र का प्राण है। इसमें असहमति और विरोध के साथ तर्क और विमर्श के लिए भी समुचित स्थान है। हर हाल में इसे बचाया जाना चाहिए। रंगमंच के भविष्य को लेकर उनके मन में कोई शंका या सवाल नहीं था। वे मानते थे कि रंगमंच जिंदगी के बेहद करीब है इसलिए यह हमेशा जिंदा रहेगा।
जब पूछा कि आपके बयान अक्सर विवाद का रूप ले लेते हैं, ऐसा क्यों?
इस पर वे बोले अभिव्यक्ति यदि नीति नियंताओं की प्रशस्ति बन जाएगी तो लोकतंत्र का बचना मुश्किल होगा।
कर्नाड जितने बड़े कलाकार थे उतने ही बड़े इंसान भी। कला मनुष्य को संवेदनशील और बेहतर इंसान बनाती है, इसके जीवंत प्रमाण थे वे। रंगमंच की दुनिया से आए थे और रंगमंच को समृद्ध करते रहे। उन्हें सुकून और संतुष्टि तो रंगमंच से ही मिलती थी। जिंदगी के रंगमंच को अलविदा कहने वाले कर्नाड लंबे समय तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार के रूप में याद किए जाते रहेंगे और लाखों लोगों को सादगी, सहजता के साथ बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देते रहेंगे।
Updated on:
11 Jun 2019 12:21 am
Published on:
11 Jun 2019 12:10 am
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