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गठबंधन में खींचतान के बीच कुमारस्वामी ने पूरे किए 100 दिन

उपलब्धियों पर आपसी मतभेदों का साया सिर्फ कर्ज माफी का वादा पूरा, अधिकांश समय राजनीतिक उठा-पटक में बीता
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बैंगलोर

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Kumar Jeevendra

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Updated: 30 Aug 2018, 12:53 AM IST

बेंगलूरु. एच डी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कर्नाटक की जद-एस व कांग्रेस गठबंधन सरकार गुरुवार को सत्ता में १०० दिन पूरे करेगी। इस दौरान सरकार की उपलब्धियों पर गठबंधन के घटकों का आपसी मतभेदों का साया ज्यादा भारी रहा। विभागों के बंटवारे से लेकर मंत्रिमंडल के गठन और फिर सरकार के कामकाज को लेकर दोनों दलों के नेताओं के बीच चली खींचतान ने विपक्ष को हर मुद्दे पर मौका दिया। कई मसलों पर कुमारस्वामी को बयानों के कारण भी विवाद हुआ, चाहे मुफ्त बस पास का मसला हो या उत्तर कर्नाटक की उपेक्षा का। बस पास सहित कई मसलों पर मंत्रियों के विरोधाभासी बयानों ने भी सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा की।
इस दौरान गठबंधन सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि रही कृषि ऋण माफी की घोषणा। हालांकि, कांग्रेस ने चुनाव में पूर्ण ऋण माफी का वादा नहीं किया था लेकिन जद-एस ने सत्ता में आने पर किसानों को कर्ज के बोझ से मुक्ति दिलाने का वादा किया था। किसानों व विपक्ष के बढ़ते दबाव के कारण कुमारस्वामी सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद संशोधित बजट में चुनावी वादे के मुताबिक किसानों का ४४ हजार ७०० करोड़ का कृषि ऋण माफ करने की घोषणा की लेकिन अब भी यह इसे लागू किए जाने में कई चुनौतियां हैं। मंत्रिमंडल ने हाल के दिनों में बजट प्रस्तावों के मुताबिक ऋण माफी के लिए आदेश जारी किए जाने को मंजूरी दे दी है लेकिन किसानों को अब भी इसका लाभ मिलने में वक्त लगेगा। अभी इसमें कई औपचारिकताएं पूरी की जानी है। हालांकि, सरकार अब छोटे किसानों व खेतिहर मजदूरों की मदद के लिए देवराज अर्स सरकार के तर्ज पर चार दशक बाद ऋण मुक्ति अध्यादेश भी लाने जा रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के विरोध के बावजूद कुमारस्वामी ने कांग्रेस आलाकमान को विश्वास में लेकर ऋण माफी का कदम उठाया था। दोनों दलों में ऋण माफी के श्रेय को लेकर मची होड़ के कारण गठबंधन इसे राजनीतिक तौर पर भुनाने में पूरी तरह सफल नहीं रहा। रही-सही कसर बजट में उत्तर कर्नाटक की उपेक्षा व कुमारस्वामी के रो कर विष पीने की बात ने पूरी कर दी। उत्तर कर्नाटक मसले पर कुमारस्वामी के बयान ने विवाद को हवा दिया। विपक्ष के आक्रामक रूख के कारण विवाद को सुलझाने के लिए खुद कुमारस्वामी को आगे आना पड़ा था।
पिछली सरकार की कुछ भाग्य योजनाओं में कटौती को लेकर भी दोनों दलों में मतभेद बने हुए हैं। अन्न भाग्य योजना के तहत मिलने वाले अनाज की मात्रा में कटौती पर कुमारस्वामी ने विधान सभा में पुनर्विचार करने की बात कही थी लेकिन अब तक कोई निर्णय नहीं हुआ। विद्यार्थियों के मुफ्त बस पास व लैपटॉप योजना की स्थिति भी ज्यादा अलग नहीं है। बस पास मसले पर काफी हंगामा भी हुआ लेकिन सरकार कोई निर्णय नहीं ले पाई है और यह लगभग अब ठंडे बस्ते में जा चुका है।
प्रशासनिक मोर्चे पर भी सरकार ज्यादा मजबूत प्रदर्शन नहीं कर पाई है। तबादलों को लेकर भी गठबंधन के घटकों में मतभेद उजागर हो चुके हैं। खुद मुख्यमंत्री कई बार दुहरा चुके हैं कि कुछ अधिकारी सरकार को चंद दिनों का मेहमान मानकर काम नहीं कर रहे हैं। विकास कार्य भी संशोधित बजट पारित होने के बाद ही रफ्तार पकड़ पाए हैं। इस बीच, कोडुगू सहित राज्य के कुछ जिलों में अतिवृष्टि और कई जिलों में सूखे की स्थिति ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई।

मंत्रिमंडल विस्तार लंबित
मंत्रिमंडल के दूसरे विस्तार में २५ मंत्रियों को शामिल किया गया लेकिन बाकी ७ रिक्त पदों को भरने का काम पूरा नहीं हो पाया है। कांग्रेस के कोटे के ६ और जद-एस के कोटे का एक पद रिक्त है लेकिन कांग्रेस असंतोष उभरने की आशंका के कारण इसे टालती रही है। पहले आषाढ़ माह के कारण विस्तार में देरी हुई और फिर शहरी निकायों के चुनाव के कारण इसे टाल दिया गया। अब सितम्बर के मध्य में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा है। पहले दौर के विस्तार में उत्तर कर्नाटक की उपेक्षा के कारण कांग्रेस पर इस क्षेत्र के नेताओं को प्रतिनिधित्व देने के लिए दबाव है। इस क्षेत्र के कांग्रेस नेताओं में असंतोष भी है।
शुक्रवार को समन्वय समिति की होने वाली बैठक में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर निर्णय होने की संभावना है। मंत्रिमंडल के साथ ही निगम-मंडलों में नियुक्तियों का मामला भी अटका हुआ है। समन्वय समिति के विस्तार पर भी दोनों दलों में मतभेद की स्थिति है।

विपक्ष से ज्यादा अपनों से परेशानी
विधानसभा चुनाव में खंडित जनादेश के बाद भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस ने जद-एस को समर्थन देने के साथ ही कुमारस्वामी का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे किया था। कांग्रेस के इस दांव से भाजपा सत्ता से दूर हो गई लेकिन कुमारस्वामी के सिर पर कांटों का ताज सज गया। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के साथ सामंजस्य बैठाना कुमारस्वामी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। दोनों नेताओं के बीच पुराने राजनीतिक मतभेद इसका एक बड़ा कारण रहा है। पिछले तीन महीने के दौरान सिद्धरामय्या के बयानों के कारण कई बार गठबंधन सरकार के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडराए। हालांकि, दोनों पार्टियों के आलोकमान के दखल के कारण हर बार मामला सुलझ गया। दोनों ही दलों असंतुष्ट नेताओं से भी परेशान हैं। ऐसे नेताओं को भाजपा ऑपरेशन कमल के तहत तोडऩे में जुटी है। हालांकि, भाजपा नेता सरकार को अस्थिर करने की कोशिश से इनकार करते रहे हैं।