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मातृभाषाओं के साथ संवाद सेतु है हिंदी

आधिकारिक तौर पर राष्ट्र भाषा नहीं होने के बावजूद हिंदी का प्रसार बढ़ा और आज वह एक तरह से बाजार की भाषा है। अहिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी का महत्व तेजी से बढ़ा है।

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Hindi Diwas 2022

Hindi Diwas 2022

निखिल कुमार.

बेंगलूरु. आजादी के बाद संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को राजभाषा के तौर पर स्वीकार किया था। हालांकि, उसके साथ ही अंग्रेजी को भी राजभाषा यानी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था। देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाली हिंदी कालांतर में देश के अलग-अलग हिस्सों में संवाद भाषा के तौर पर स्थापित हो गई। आधिकारिक तौर पर राष्ट्र भाषा नहीं होने के बावजूद हिंदी का प्रसार बढ़ा और आज वह एक तरह से बाजार की भाषा है। अहिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी का महत्व तेजी से बढ़ा है। विद्यार्थियों में हिंदी पढऩे की ललक बढ़ी है। इसमें हिंदी फिल्मों का योगदान भी काफी रहा। बड़े बाजार के कारण हिंदी में रोजगार की संभावनाएं बढऩे से इसके प्रति आकर्षण भी बढ़ा है। हालांकि, अहिंदी भाषी राज्यों में यदा-कदा हिंदी को लेकर राजनीतिक विरोध के स्वर भी उभरते रहे हैं। संवाद सेतु का काम करने वाली हिंदी कैसे क्षेत्रीय भाषाओं के साथ आगे बढ़े, इस पर पत्रिका ने हिंदी के प्राध्यापकों और शिक्षकों से बातचीत कर उनकी राय जानी। इन सबका कहना था कि मातृभाषाओं के साथ हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अलग-अलग हिस्सों में दूसरी भारतीय भाषाएं भी वैकल्पिक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए ताकि लोगों के बीच भाषाई एकता का भाव विकसित हो।

'भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी'
भाषा के रूप में हिंदी देश की एकता का सूत्र है। हिंदी विभिन्न भाषाओं के उपयोगी और प्रचलित शब्दों को अपने में समाहित करके सही मायनों में भारत की संपर्क भाषा होने की भूमिका निभा रही है। हिंदी के महत्व को रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बड़े सुंदर रूप में प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा था, 'भारतीय भाषाएं नदियां हैं और हिंदी महानदी।Ó हिंदी के इसी महत्व को देखते हुए तकनीकी कंपनियां इस भाषा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें बड़े पैमाने पर हिंदी में लिखी जा रही हैं। इसमें अनुवाद बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अनुवाद की उपादेयता स्वयं सिद्ध है। भारत के विभिन्न प्रदेशों के साहित्य में निहित मूलभूत एकता के स्वरूप को निखारने के लिए अनुवाद ही अचूक साधन है। अनुवाद द्वारा मानव की एकता को रोकने वाली भौगोलिक और भाषायी दीवारों को ढहाकर विश्वमैत्री को और सुदृढ़ बना सकते हैं। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया जा सकता है। आज विश्व में अनुवाद की आवश्यकता जीवन के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में अवश्य महसूस की जा रही है। इस प्रकार मातृभाषाओं के साथ हिंदी को बढ़ाया जा सकता है।
-डॉ. कविता पनिया, अध्यापिका, क्राइस्ट जूनियर कॉलेज

शिक्षा के माध्यम के रूप मे प्रयोग आवश्यक
भारतीय जीवन के बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अंग्रेजी भाषा के दखल से भारत को बहुत भारी नुकसान हुआ है। इस दखल का सबसे बड़ा कारण कुछ भ्रम हैं, जो हमारे दिलो-दिमाग में बस गए हैं या बसा दिए गए हैं। भारत का दक्षिण कोरिया, जापान, चीन जैसे देशों से पीछे रह जाने का एक बड़ा कारण भारतीय शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में अंग्रेजी भाषा का दखल है। किसी भाषा के जीवित रहने और उसके विकास के लिए उस भाषा का शिक्षा के माध्यम के रूप मे प्रयोग आवश्यक है। हिंदी को प्रशासन की भाषा बनाने का सपना पूरा नहीं हुआ है। हिंदी आज के युग की आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण सक्षम है। इसमें संभावनाएं अनंत हैं। इसके अलावा देश के हर हिस्से में दूसरे हिस्से की एक भाषा पढ़ाना फायदेमंद रहेगा।
- जयश्री नितिन कांबले, हिंदी अध्यापिका, ऑर्किड इंटरनेशनल स्कूल

हिंदी भारतीय अस्मिता की पहचान
बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। इंग्लैंड सहित यूरोप के लगभग सभी देशों के बच्चे अपनी मातृ भाषा के साथ-साथ एक दो अन्य भाषाएं कम-से-कम बोल या समझ लेते हैं। दरअसल, यह उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है। हिंदी भाषी प्रदेशों के शिक्षितों में कई लोग तो हिंदी के अलावा भारत की कोई दूसरी भाषा बोल क्या समझ भी नहीं पाते हैं। त्रि-भाषा नीति को ठीक से लागू करने की जरूरत है। हिंदी अपने अपार अभिव्यक्ति सामथ्र्य के बल पर आज के युग की आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण सक्षम है। इसमें संभावनाएं अनंत हैं। आजादी के बाद हिंदी राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा का माध्यम भी बनी।
- डॉ. मो. रियाज खान, हिंदी प्रोफेसर, बी.एम.एस महिला महाविद्यालय

मातृभाषा की तरह हिंदी भी महत्वपूर्ण
जिस तरह मातृभाषा और गृह राज्य की प्राथमिक भाषा सीखना और उसका सम्मान करना महत्वपूर्ण है, उसी तरह हिंदी सीखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। महान विविधता वाले देश में, लोगों के लिए कई अलग-अलग भाषाओं में बातचीत करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में हिंदी लोगों को जोडऩे का काम करेगी। स्थानीय भाषाओं के साथ हिंदी को भी संपर्क भाषा के रूप में बढ़ाया जाना चाहिए। हिंदी सदियों से इस देश की संपर्क भाषा का काम करती रही है। प्रशासन में भी इसका उपयोग होता रहा है। यह समाज के साथ-साथ सरकार के भीतर भी आसान लेनदेन को सक्षम करेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने त्रिभाषा नीति को सही महत्व दिया है और यह सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है कि सभी छात्र हिंदी सहित अलग-अलग भाषाएं सीखें। नई पीढ़ी को हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर गौरव होना चाहिए।
- नीरू अग्रवाल, ट्रस्टी, ग्रीनवुड हाई इंटरनेशनल स्कूल

मातृभाषा के बाद सबसे सुगम्य और सुबोधमय
भारत अनेक समृद्ध भिन्न-भिन्न मातृभाषाओं का देश है। इसके साथ ही हिंदी ऐसी भाषा है, जो कि उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत, पूर्वी भारत से लेकर पश्चिम भारत तक में बोली जाती है। ये भी हमारे देश के कई लोगों की मातृभाषा ही है। जिस प्रकार सभी लोग अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार हिन्दी भाषा का भी सम्मान होना चाहिए। हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो कि मातृभाषा के बाद सबसे सुगम्य और सुबोधमय भाषा है। विडम्बना यह है कि इतनी सुगम्य और सुबोधमय होने के बावजूद भी हिंदीतर भाषी क्षेत्र में इसकी उतनी प्रचलन नहीं है। इसका कारण है विदेशी भाषा का प्रभाव तथा हमारी मानसिकता। हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए हमें इन दोनों प्रकार की जंजीरों को तोड़कर आगे बढऩा होगा। इसके अलावा जिस प्रकार हम अपनी मातृभाषा को सीखने पर जोर देते हैं, उसी प्रकार देश के दूसरे हिस्से की भाषा को भी सीखने पर ध्यान देना चाहिए। हिंदी विषय की पढ़ाई दुनिया में नई-नई जगहों में शुरू हुई है। लेकिन, स्वयं अपने देश के शिक्षण संस्थानों में शिक्षण माध्यम के रूप में सिकुड़ती जा रही है। हिंदी को बढ़ावा देने की जरूरत है।
- डॉ. मधुछन्दा चक्रवर्ती, पूर्व हिंदी अध्यापिका, माउंट कार्मेल कॉलेज

मातृभाषा की अहम भूमिका
वैश्विक पटल पर यदि भारत को देखा जा, तो इस देश की गरिमा इसकी भाषाई विविधता में स्थित एकता में है। हर राज्य की भाषा उसकी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इसलिए जब मातृभाषा का प्रसंग आता है, तो वह उस राज्य कि अपनी सबसे बड़ी पहचान है। देश के उन्नयन में मातृभाषा की अहम भूमिका है। मातृभाषा के साथ एक दूसरे राज्य की भाषा सीखें, इससे भारत की सांस्कृतिक एकता और अखंडता की वृद्धि ही होगी। जो व्यक्ति अपनी मां, मिट्टी और मातृभाषा का सम्मान करता हो, वह अन्य भारतीय भाषाओं का भी सम्मान करेगा। हर किसी को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त एक प्रांतीय भाषा जरूर सीखना चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रम में इसे शामिल करना आवश्यक है , जिससे प्रांतीयता का भेदभाव भुलाकर एक दूसरे के संस्कृति को हर एक भारतीय अपना सके। इसे भारत निर्माण का एक महत्वपूर्ण सोपान भी कहा जा सकता है।
- डॉ. कोयल बिस्वास, हिंदी विभागाध्यक्ष, माउंट कार्मेल कॉलेज

सेतु के रूप में काम कर सकती है हिंदी
हर बच्चा अपनी मातृभाषा को सबसे पहले सीखता है। हमारे सामने अब प्रश्न यह उठता है कि मातृ भाषाओं के साथ कैसे हिंदी आगे बढ़ सकती है या अन्य भाषाओं के साथ कैसे संपर्क स्थापित कर सकती है या मातृ भाषा बोलते- बोलते बच्चा कैसे हिंदी को समझे, पढ़े और लिखें? हिंदी सरल और इतनी बोधगम्य है कि थोड़े से अभ्यास से समझ सकते हैं। मातृभाषा के साथ बच्चे आसानी से हिंदी भाषा को सीख सकते हैं। यह सेतु के रूप में काम कर सकती है। आज हिंदी 70 करोड़ लोगों की भाषा है। जैसे चीन, जापान, रूस तथा तुर्की में अपनी भाषा में सरकारी कार्य होता है, उसी तरह हमारे देश में भी हिंदी को अनिवार्य विषय घोषित कर दिया जाना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में पहली बार हिंदी में भाषण देकर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था। लेकिन, अपने ही देश में हिंदी की इतनी अवहेलना होती है। अन्य मातृ भाषाओं के साथ इसे पढ़ा कर हम हिंदी को उसका खोया स्थान दिला सकते हैं।
- डॉ. शम्मी श्रीवास्तव, अध्यापिका, विद्याशिल्प एकेडमी

हिंदी भारत का गौरव
हिंदी भारत की राजभाषा है यानी कि राज्य के सरकारी कामकाज में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा। भारतीय संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिला है। भारत में 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का स्थान मिला हुआ है, जिनमें अंग्रेजी और हिंदी भी शामिल है। हिंदी को मातृभाषा का सम्मान भी प्राप्त है। 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। भारत के सभी प्रदेशों में वहां की स्थानीय भाषा के अलावा हिंदी भी बोली व समझी जाती है। हिंदी भी संस्कृत एवं तमिल की तरह भारत की प्राचीन भाषाओं में से एक है। इस भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संस्कृत, अंग्रेजी तथा उर्दू भाषाओं का भी समावेश है, जिनके शब्दों की पहचान कुछ विशेष चिन्हों से की जाती है। एक और खास बात यह भी है कि हिंदी को जैसे लिखते हैं, उसे वैसे ही बोलते हैं। यह भारत के अलावा अन्य कई देशों, जैसे - नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, मॉरीशस, इंडोनेशिया, अमरीका, बांग्लादेश, श्रीलंका तथा फिजी में भी बोली जाती है। हिंदी भारत का गौरव और अभिमान है, इसलिए इसको राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।
- प्रोमिला अय्यर, सेवानिवृत्त शिक्षिका