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17 दिन में प्रदेश में 12.7 और बेंगलूरु में 30 गुना बढ़े आइसीयू के मरीज

10 जून को प्रदेश में 14 मरीज आइसीयू में थे। इनमें से चार मरीज बेंगलूरु के अस्पतालों में थे। लेकिन 26 जून को प्रदेश के अस्पतालों के आइसीयू में भर्ती मरीजों की संख्या बढ़कर 178 पहुंच गई।

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ventilators

45 ventilators in hospitals, situation will be difficult to control in bhilwara

-हाइपोक्सिया और हैप्पी हाइपोक्सिया बनी चुनौती

बेंगलूरु. कर्नाटक सहित बेंगलूरु शहरी जिले के कोविड-19 अस्पतालों के आइसीयू ( ICU patient numbers jump 30 fold in 17 days in Bengaluru) में भर्ती मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 17 दिन में आइसीयू के मरीज 12.7 गुना और बेंगलूरु के अस्पतालों के आइसीयू के मरीज 30 गुना बढ़े हैं। 10 जून को प्रदेश में 14 मरीज आइसीयू में थे। इनमें से चार मरीज बेंगलूरु के अस्पतालों में थे। लेकिन 26 जून को प्रदेश के अस्पतालों के आइसीयू में भर्ती मरीजों की संख्या बढ़कर 178 पहुंच गई। सबसे ज्यादा 123 मरीज बेंगलूरु में हैं।

विक्टोरिया कोविड-19 अस्पताल के एक चिकित्सक ने बताया कि असल में स्थिति उतनी गंभीर नहीं है। लेकिन कई निजी अस्पताल समय रहते सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (एसएआरआइ) और इन्फ्लूएंजा लाइक इंफेक्शन यानी आइएलआइ (जुकाम, खांसी व बुखार के मरीज) के मरीजों में कोरोना के संक्रमण की जांच नहीं कर रहे हैं। ज्यादातर निजी अस्पताल अंतिम समय में मरीजों को सरकारी अस्पताल रेफर कर रहे हैं। आइसीयू में मरीज बढऩे का यह एक बड़ा कारण है। दूसरी मुख्य वजह है मरीजों का देर से चिकित्सकों के पास पहुंचना। ज्यादातर मामलों में मरीजों को दो से तीन दिन आइसीयू में रखने की जरूरत पड़ती है। हालत स्थिर होते ही मरीज को वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाता है।

तेजी से बढ़ रहे आइएलआइ और एसएआरआइ के मामले

स्वास्थ्य आयुक्त पंकज कुमार पांडे ने बताया कि आइसीयू में भर्ती किए जाने वाले ज्यादातर मरीज अन्य बीमारियों से भी पीडि़त हैं। बेंगलूरु शहर में आइएलआइ और एसएआरआइ के मामले तेजी से बढ़े हैं। करीब 60 फीसदी मरीज आइएलआइ या एसएआरआइ के हैं। लोगों को जागरूक करने के लिए जल्द ही एक अभियान चलाने की योजना है।

ऐसा तब तक नहीं होता जब तक...
हाइपोक्सिया (Hypoxia - वह स्थिति जिसमे शरीर या शरीर के अंग को ऊतक स्तर पर पर्याप्त ऑक्सीजन नही मील पाती है) के मरीज भी बढ़े हैं। ऐसे मरीजों के कोरोना संक्रमित होने का खतरा अधिक है।

साइलेंट या हैप्पी हाइपोक्सिया (Silent or Happy Hypoxia ) भी चुनौती है। इसमें कोरोना संक्रमित मरीजों के रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा (Blood Oxygen Level) काफी कम होने के बावजदू मरीज को सांस लेने में तकलीफ नहीं होती है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा 80 फीसदी से कम होने के बावज़ूद भी मरीज को सांस लेने में कोई तकलीफ नहीं हो रही है। ऑक्सीजन की मात्रा कम होने की स्थिति में लोग बीमार दिखने चाहिए परंतु साइलेंट हाइपोक्सिया के मामलों में ऐसा तब तक नहीं होता जब तक कि तीव्र श्वसन संकट जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हो जाती है। सामने आए एक ऐसे ही मामले में 32 वर्षीय मरीज का ऑक्सीजन स्तर घटकर 58 फीसदी हो गया था। लेकिन मरीज की स्थिति सामान्य थी।

पल्स ऑक्सीमीटर माप 95-100 फीसदी होनी चाहिए
पल्स ऑक्सीमीटर (pulse oximeter) एक ऐसा यंत्र है जिसके माध्यम से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा का पता लगाया जाता है। स्वस्थ लोगों में पल्स ऑक्सीमीटर माप 95-100 फीसदी होनी चाहिए। 95 फीसदी से कम माप फेफड़ों में समस्या के संकेत हो सकते हैं। ऑक्सीजन स्तर 92 फीसदी से कम हो जाए तो मरीज को ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है। हालांकि कई पल्मोनोलॉजिस्ट पल्स ऑक्सीमीटर के इस्तमाल में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। मणिपाल अस्पताल में आइसीयू विभाग के प्रमुख और पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अजीत कुमार ए. के. ने बताया कि विशेषकर घबराहट व तनाव से गुजर रहे लोगों व मरीजों को कम पल्स ऑक्सीमीटर माप से एकाएक चिंतित होने की जरूरत नहीं है। हां, चिकित्सकीय परामर्श में देरी नहीं करनी चाहिए। समस्या के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।