
गर्भ में ही हो शिशुओं में गुर्दा संबंधी बीमारियों की पहचान
निखिल कुमार
बेंगलूरु. बच्चों में गुर्दे की बीमारी (kidney disease in children) तेजी और चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। देश में बच्चों के गुर्दे संबंधित बीमारियों के लिए Pediatric nephrologists की भारी कमी है। गिने-चुने करीब 160-175 पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट हैं। इनमें से 15-20 Karnataka में हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गर्भ में होने के दौरान भी शिशु को गुर्दे की समस्या हो सकती है। स्कैन में बीमारी का पता चल जाता है। इस उम्र में कम एम्नियोटिक द्रव गुर्दे की बीमारियों का एक महत्वपूर्ण मार्कर हो सकता है। समय रहते पहचान से गुर्दे को एक केंद्र बिंदु पर फेल होने से बचाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि गर्भवती महिलाएं 20वें सप्ताह में अल्ट्रासाउंड जरूर कराएं। सेंट जॉन मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (St. John's Medical College Hospital) में पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट Dr. Anil Vasudevan ने राजस्थान पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला।
बच्चों में गुर्दे की बीमारियों की व्यापकता पर उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय रजिस्ट्री और सर्वेक्षणों की कमी के कारण बच्चों में सीकेडी (क्रोनिक किडनी डिजीज) के बोझ या व्यापकता का अनुमान लगाना कठिन है। लेकिन, स्थिति चिंताजनक है। बार-बार पेशाब आना, मूत्र मार्ग में बार-बार संक्रमण, हड्डी विकृति, उच्च रक्तचाप, आयरन सिरप के बावजूद कम हीमोग्लोबिन, बिस्तर में बार-बार पेशाब करना, बिना कारण पेट में नियमित दर्द, मूत्र पथ संक्रमण या अवरोध और जन्म से ही पेशाब में दिक्कत बच्चों में गुर्दे की बीमारी के लक्षण हो सकते हैं।
तीन वर्ष की उम्र में हुआ गुर्दा प्रत्यारोपण
बच्चों में गुर्दा प्रत्यारोपण (Kidney transplant in children) पर उन्होंने कहा कि प्रत्यारोपण का निर्णय बच्चे के वजन पर भी निर्भर करता है। सेंट जॉन अस्पताल में 9.8 किलोग्राम के बच्चे का गुर्दा प्रत्यारोपण हुआ है। इस बच्चे की उम्र महज तीन वर्ष थी। विकसित देशों में 8-10 किलो वजन वाले बच्चों का भी गुर्दा प्रत्यारोपण किया जाता है।
बच्चों के लिए समर्पित केंद्र कम
देश में पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट की कम संख्या पर उन्होंने बताया कि नेफ्रोलोजी में पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजी एक नई उप-विशेषता है और किडनी रोग वाले बच्चों के लिए समर्पित केंद्र बहुत कम हैं। देश में प्रशिक्षण के अवसरों की कमी है। देश में केवल 3 केंद्र हैं, जिनमें पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी (3 वर्ष) में डीएम पाठ्यक्रम है। केवल 4-5 केंद्र हैं, जो अल्पकालिक फेलोशिप (एक से दो वर्ष) प्रदान करते हैं।
बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत
डॉ. वासुदेवन ने बताया कि ज्यादातर पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट बड़े शहरों में हैं। ज्यादातर बाल मरीज वयस्क नेफ्रोलोजिस्टों के हवाले हैं। पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट हों तो बच्चों को उन्हीं से दिखाना चाहिए। वयस्क नेफ्रोलोजिस्ट भी बच्चों का उपचार कर सकते हैं। बशर्ते प्रशिक्षण और नैदानिक अभ्यास के दौरान उन्हें ज्यादा एक्सपोजर मिला हो। पीडियाट्रिक नेफ्रोलोजिस्ट की कमी तो है पर यूरोलोजिस्ट, बाल रोग विशेषज्ञ आदि चिकित्सकों की मदद से उपचार आसान हो जाता है। बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत होती है।
Published on:
12 Mar 2023 06:44 pm
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