
राजीव मिश्रा
बेंगलूरु. वैश्विक अंतरिक्ष कारोबार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के उद्देश्य से बाजार की जरूरतों के मुताबिक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ISRO ने नया रॉकेट 'एसएसएलवीÓ SSLV विकसित कर लिया है। इसका पहला विकासात्मक प्रक्षेपण रविवार को श्रीहरिकोटा से होगा।
एसएसएलवी की डिजाइनिंग और विकास मुख्य रूप से दो उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया गया है। पहला, यह कि 10 से 500 किलोग्राम तक के सूक्ष्म एवं लघु उपग्रहों का प्रक्षेपण अत्यंत किफायती दर पर किया जा सके। इससे पीएसएलवी पर निर्भरता नहीं रहेगी, जो कि तुलनात्मक रूप से लघु उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए महंगा पड़ता है। दूसरा, बाजार की जरूरतों के मुताबिक ऑन डिमांड इसे निजी उद्योगों द्वारा तैयार किया जा सके। इसरो को उम्मीद है कि एसएसएलवी से वह वैश्विक अंतरिक्ष कारोबार में कड़ी प्रतिस्पद्र्धा देगा। इससे देश में अंतरिक्ष गतिविधियां और कारोबार बढ़ेगा।
5 साल, ₹170 करोड़ लागत
दरअसल, एसएसएलवी का विकास पांच वर्ष में लगभग 170 करोड़ रुपए की लागत से किया गया है। इसके प्रक्षेपण पर अनुमानत: केवल 30 से 35 करोड़ रुपए खर्च होगा, जो कि पीएसएलवी की तुलना में काफी कम है। एसएसएलवी 500 किलोग्राम तक के वजनी उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए प्रति किलोग्राम अत्यंत किफायती दर पर उपलब्ध होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसरो को टक्कर देना दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
6 इंजीनियर, 1 सप्ताह
इस रॉकेट की एक खासियत यह भी है कि जहां पीएसएलवी को तैयार करने में जहां 30 से 45 दिन और 600 वैज्ञानिकों-इंजीनियरों के भारी-भरकम टीम की आवश्यकता होती है। वहीं, एसएसएलवी 6 इंजीनियरों की टीम केवल एक सप्ताह में प्रक्षेपण के लिए तैयार कर देगी। इसे अत्यंत कम बुनियादी सुविधाओं के साथ प्रक्षेपित किया जा सकता है। इसरो इस रॉकेट के लिए एक अलग प्रक्षेपण स्थल कुलशेखरपट्टणम में तैयार कर रहा है। आगे चलकर एसएसएलवी के इंटीग्रेशन से लेकर प्रक्षेपण तक की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को सौंप दी जाएगी। इससे देश के अंतरिक्ष कारोबार को एक नई ऊंचाई मिलने की उम्मीद है।
एक मिशन, अनेक उपग्रह, कई आर्बिट
एसएसएलवी तीन चरणों वाला रॉकेट है। तीनों चरण ठोस ईंधन वाले हैं। पहले चरण (एसएस-1) में 87 टन, दूसरे चरण (एसएस-2) में 7.7 टन और तीसरे चरण (एसएस-3) में 4.5 टन ठोस ईंधन होगा। उपग्रहों के कक्षा में स्थापित करने के लिए एसएसएलवी में तरल प्रणोदन आधारित वीटीएम (वेलोसिटी ट्रिमिंग मॉड्यूल) लगा है। वीटीएम में 50 किलोग्राम तरल ईंधन होगा, जो उपग्रहों को उनकी कक्षा तक पहुंचाएगा। गौरतलब है कि पीएसएलवी चार चरणों वाला रॉकेट है जिसमें दो ठोस और दो तरल ईंधन चरण होते हैं। पीएसएलवी की तरह एसएसएलवी भी एक साथ कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित कर सकता है। इसरो वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों इस रॉकेट के कई प्रक्षेपण कम समय अंतराल में देखने को मिलेंगे।
एसएसएलवी एक नजर में:
-ऊंचाई: 34 मीटर
-व्यास : 02 मीटर
-वजन: 120 टन
पहला मिशन, दो उपग्रह
अपने पहले मिशन 'एसएसएलवी डी-1/ईओएस-02Ó में यह नव विकसित रॉकेट दो उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करेगा। मुख्य पे-लोड भू-अवलोकन उपग्रह ईओएस-02 है जिसका कुल वजन 135 किलोग्राम है। दूसरा उपग्रह 'आजादी सैटÓ है, जिसका निर्माण देश के 75 स्कूलों की 750 छात्राओं ने किया है। 'आजादी सैटÓ का कुल वजन 8 किलोग्राम है और इसमें कुल 75 पे-लोड हैं। प्रत्येक पे-लोड का वजन लगभग 50 ग्राम है। इन सभी पे-लोड का इंटीग्रेशन 'स्पेस किड्ज इंडियाÓ के छात्रों की टीम ने किया है। दोनों उपग्रहों को लगभग 350 किमी वाली कक्षा में स्थापित किया जाएगा। उपग्रह से प्रसारित होने वाले आंकड़े भी 'स्पेस किड्ज इंडियाÓ द्वारा तैयार ग्राउंड स्टेशन पर प्राप्त किए जाएंगे। मिशन श्रीहरिकोटा के प्रथम लांच पैड से प्रक्षेपित किया जाएगा। मिशन की योजना के मुताबिक प्रक्षेपण के लगभग 742 सेकेंड बाद ईओएस-02 और 792 सेकेंड बाद आजादी सैट पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो जाएगा।
Published on:
07 Aug 2022 03:06 am
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