
गुरु कृपा प्राप्त करने का अध्ययन है-विनय श्रुत
बेंगलूरु. अशोकनगर शूले में विराजित श्रमण संघीय डॉ. समकित मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन किया और उसका विवेचन करते हुए कहा-गुरु कृपा प्राप्त करने का अध्ययन है-विनय श्रुत। बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करने के मंत्र प्रथम अध्ययन में हैं। देव और धर्म की कृपा तभी मिलती है जब हम गुरुकृपा पा लेते हैं। बड़ों का आशीष पाने के बाद जीवन सुरक्षित बन जाता है। जिसे गुरु कृपा प्राप्त हो जाती है उसके कान कभी सड़ते नहीं। कान सडऩे पर मन सड़ जाता है, मन के सडऩे पर जीवन बर्बादी की राह पकड़ लेता है। जिस प्रकार सडे कान की कुतिया नहीं कहीं पर भी ठोर नहीं पाती उसी प्रकार दुर्गुणों से प्यार करने वाला भी कहीं पर आदर नहीं पाता। अच्छी बातों को छोड़कर जो गलत कार्यों में जीवन को लगाते हैं। उनका तन मानव का हो जाता है परंतु वह सूअर (पशु) के समान है। विनीत का यह लक्षण है कि वह गुरु के भावों को समझकर कार्य करता है। मुनि ने कहा पांवों से मस्तक लगाना आसान है परंतु चेतना के साथ अंतर्मन का जुडऩा कठिन है। घर की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए घर के बड़े यदि अनुशासन करें तो क्रोध नहीं करें। जो समझदार होता है वह श्नमा को धारण करता है; क्रोध को असत्य करता है। जिससे श्रमा की जीत हो जाती है। कोई हमें उपालंभ दे अप्रिय शब्द बोले तो उसे भी हितकारी समझकर ग्रहण कर लो। बड़ों के अनुशासन को स्वीकार करके आगे बढऩे से जीवन की बीमारी खत्म होती है।
मुनि ने कहा कि गलती का सेवन हो जाने पर उसे छिपाए नहीं बल्कि बड़ों के समक्ष प्रकट कर दें। वर्तमान की युवा पीढ़ी के लिए परमात्मा द्वारा दिया मंत्र महत्वपूर्ण है कि गलती को छिपाने से वह बढ़ती है इसलिए उसे बड़ों को बताएं जिससे समाधान प्राप्त हो सके। गुरु (पिता) शिष्य (बेटे) का भविष्य बनाता है परंतु शिष्य गुरु का जीवन सुधार भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। गुरु की आज्ञा का न मानने वाला दुष्ट स्वभावी शिष्य शांत गुरु को भी क्रोधी बना देता है। संतान (शिष्य) का मिलना बड़ी बात नहीं है बल्कि सुयोग्य पुत्र का मिलना पुण्यवाणी है।
Published on:
26 Oct 2020 06:48 pm
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