
कोविड-19 : पांच से 25 हजार रुपए निर्धारित
बेंगलूरु. प्रदेश सरकार ने अंतत: तय शुल्क के साथ निजी अस्पतालों को कोविड-19 के मरीजों के उपचार की अनुमति (With Price Capping Karnataka Government permits Private Hospitals to treat Covid Patients) दे दी है। उपचार के लिए पांच से 25 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं। हाई एंड ड्रग व प्लाज्मा थेरेपी आदि को छोड़ पीपीइ व अन्य उपभोग्य सामग्री शुल्क भी शामिल है।
प्रदेश के मुख्य सचिव टी. एम. विजय भास्कर की ओर से जारी अधिसूना में सरकार की ओर से भेजे गए मरीजों व खुद अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों के लिए अलग-अलग शुल्क निर्धारित है। सरकार की ओर से भेजे गए मरीजों के लिए निजी अस्पतालों को कोविड बिस्तरों का 50 फीसदी आरक्षित रखना होगा। इनमें उच्च निर्भरता इकाई सहित वेंटिलेटर और बिना वेंटिलेटर वाले बिस्तर भी शामिल होंगे। शेष 50 फीसदी बिस्तरों का इस्तेमाल निजी अस्पताल सीधे पहुंचने वाले मरीजों के लिए कर सकेंगे।
विभाग से रेफर किए गए मरीजों से निजी अस्पताल जनरल वार्ड के लिए 5200 रुपए, उच्च निर्भरता इकाई वार्ड (ऑक्सीजन के साथ) 7 हजार, बिना वेंटिलेटर आइसोलेशन आइसीयू के लिए 8500 रुपए और वेंटिलेटर आइसोलेशन आइसीयू के लिए दस हजार से ज्यादा नहीं वसूल सकेंगे।
खुद से अस्पताल पहुंचने और नकद में उपचार शुल्क का भुगतान करने वाले गैर बीमा मरीजों से निजी अस्पताल जनरल वार्ड के लिए 10 हजार रुपए, उच्च निर्भरता इकाई वार्ड के लिए 12 हजार रुपए, बिना वेंटिलेटर आइसोलेशन आइसीयू के लिए 15 हजार रुपए और वेंटिलेटर वाले आइसोलेशन आइसीयू के लिए 25 हजार रुपए से ज्यादा नहीं ले सकेंगे। डबल बेड वार्ड के लिए अतिरिक्त 10 फीसदी व सिंगल बेड वार्ड के लिए अतिरिक्त 25 फीसदी वसूलने के लिए निजी अस्पताल स्वतंत्र होंगे जबकि विशेष वार्ड यानी सुइट्स के लिए कोई उच्चतम दर निर्धारित नहीं है।
पहले से मौजूद बीमारियों को छोड़ उपचार के दौरान उत्पन्न अन्य जटिलताएं व सर्जरी सहित कोरोना संक्रमित गर्भवती महिलाओं के मामले में आयुष्मान भारत आरोग्य कर्नाटक के तहत उपलब्ध पैकेज लागू होंगे। कुछ निजी अस्पताल सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क से संतुष्ट नहीं हैं। इनके अनुसार निजी अस्पताल संघ ने सरकार को शुल्क संबंधित जो प्रस्ताव भेजा था, उसकी तुलना में मौजूदा निर्धारित शुल्क बेहद कम है। इतने में तो उपभोग्य सामग्री शुल्क तक का भुगतान नहीं हो पाएगा। कई चिकित्सकों ने इस शुल्क को मरीजों, चिकित्सकों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को खतरे में डालना करार दिया है।
ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला के अनुसार प्रदेश सरकार ने बीमा वाले मरीजों को निर्धारित शुल्क से बाहर रखा है। ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। उनके अनुसार कई राज्यों ने सभी मरीजों को समान माना है और हर वार्ड के लिए उपचार शुल्क एक है। सरकारी अधिकारियों द्वारा भेजे गए और खुद से अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की तो बात ही नहीं होनी चाहिए। इससे असमंजस की स्थिति पैदा होगी।
उपचार के बाद ठीक होने वाले मरीजों के विश्लेषण से पता चलता है कि एक मरीज को अस्पताल में औसतन 17 दिन रहना पड़ता है। निजी अस्पताल के जनरल वार्ड में मरीज 17 दिन भर्ती रहा तो उसे न्यूनतम 1.7 लाख रुपए खर्च करने होंगे। कई मरीज तीन सप्ताह तक रहे हैं। ऐसे मरीजों की संख्या कम ही है जो दस या कम दिन में ठीक हुए हों।
Published on:
24 Jun 2020 06:41 pm
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