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प्लास्टिक बेबी ने दी मौत को मात

चिकित्सकों के अनुसार रेयरेस्ट ऑफ द रेयर (rarest of the rare) की श्रेणी में आने वाली यह बीमारी नवजातों को न हो, इसके लिए गहन शोध जारी है

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प्लास्टिक बेबी ने दी मौत को मात

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निखिल कुमार

आमतौर पर ऐसे करीब 50 फीसदी मामलों में इस बीमारी से पीड़ित ज्यादातर शिशु जीवन के पहले कुछ सप्ताह में ही जिंदगी की जंग हार जाते हैं, लेकिन एक बेहद दुर्लभ मामले में Bengaluru के एक अस्पताल के चिकित्सकों ने एक कोलोडियन या प्लास्टिक बेबी (Collodion or Plastic Baby) को बचा लिया है। नवजात ने भी गजब की इच्छाशक्ति दिखाई और मौत के मुंह से बाहर निकल आया। इस सफलता से ऐसे अन्य मरीजों के लिए भी उम्मीद जागी है।

चिकित्सकों के अनुसार रेयरेस्ट ऑफ द रेयर (rarest of the rare) की श्रेणी में आने वाली यह बीमारी नवजातों को न हो, इसके लिए गहन शोध जारी है।

हंसने, रोने, हाथ पैर हिलाने पर त्वचा के फटने का डर

जन्म के समय शिशु का वजन 665 ग्राम था। एक मोटी झिल्ली ने पूरे शरीर को ढक रखा था, जिसके कारण आंखें भी ठीक से बंद नहीं हो पाती थीं। ऊपर का होंठ बाहर की ओर मुड़ा हुआ था। बच्चे की त्वचा प्लास्टिकनुमा लाल थी। हालांकि, कोलोडियन बेबी प्लास्टिक का नहीं होता बल्कि उसके शरीर की खाल प्लास्टिक की तरह होती है। बच्चे के हंसने, रोने या हाथ पैर हिलाने पर त्वचा के फटने का डर रहता है।

गर्भ में शिशु का अधूरा विकास

कोलोडियन बेबी या प्लास्टिक बेबी एक जैनेटिक डिसआर्डर (Genetic Disorder) है। गर्भ में शिशु का संपूर्ण विकास नहीं हो पाता। chromosome में गड़बड़ी की वजह से एक लाख बच्चों में किसी एक को यह बीमारी होती है। सामान्यत: महिला व पुरुष में 23-23 क्रोमोसोम पाए जाते हैं। यदि दोनों के क्रोमोसोम संक्रमित हों तो पैदा होने वाला बच्चा कोलोडियन हो सकता है। ऐसे बच्चों को संक्रमण का खतरा बना रहता है। यदि किसी परिवार में ऐसा बच्चा होता है तो दूसरे बच्चे के भी प्रभावित होने की 25 फीसदी संभावना रहती है। इलाज कराने के बाद गर्भधारण किया जाए तो काफी हद तक गर्भस्थ शिशु को बीमारी से बचाया जा सकता है।

मजबूत इच्छाशक्ति ने किया चकित

Mazumdar Shaw Medical Center में बाल रोग विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव अग्रवाल और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हरिणी श्रीधरन ने बताया कि collodion syndrome विश्व की दुर्लभतम बीमारियों में से एक है। अविकसित फेफड़ों के कारण नवजात ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था। नियोनेटल सेप्सिस (रक्तप्रवाह संक्रमण) और लैरींगोमालेसिया ने परेशान कर रखा था। खाना-पीना संभव नहीं हो पा रहा था, लेकिन जीने की बहुत मजबूत इच्छाशक्ति थी। लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर विशेष जैली लगाकर उसे आइसोलेशन में रखा गया। निरंतर इलाज से तबीयत सुधरती रही। चार सप्ताह के उपचार के बाद बच्चे का वजन ठीक-ठाक हो गया है। ओरल फीड शुरू कर दिया गया है। न्यूनतम ऑक्सीजन सपोर्ट के साथ उसे डिस्चार्ज कर दिया गया है। आगे भी उपचार जारी रहेगा।

जन्म के बाद एकाएक सामने आती है बीमारी

डॉ. हरिणी ने बताया कि शिशु के जन्म के बाद ही कोलोडियन सिंड्रोम अचानक सामने आता है। गर्भावस्था के दौरान के नियमित जांचों में आम तौर पर इसका पता लगाने का कोई तरीका नहीं है। स्कैन में गर्भस्थ शिशु के होंठ या आंखें ऊपर की ओर हों तो कोलोडियन सिंड्रोम का संदेह हो सकता है। शिशु के उपचार में psychiatrist डॉ. मंजुला ने भी अहम भूमिका निभाई।