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परिवर्तन सृष्टि का नियम-साध्वी भव्यगुणाश्री

धर्मसभा का आयोजन

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परिवर्तन सृष्टि का नियम-साध्वी भव्यगुणाश्री

परिवर्तन सृष्टि का नियम-साध्वी भव्यगुणाश्री

बेंगलूरु. आदिनाथ जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ शांतिनगर में विराजित साध्वी भव्यगुणाश्री व साध्वी शीतलगुणाश्री ने कहा कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है। यहां स्थिर कुछ भी नहीं रहता। पल-पल, क्षण-क्षण, बदलता रहता है सृष्टि में। साध्वी भव्यगुणाश्री ने कहा कि इस परिवर्तन से हम कभी दुखी हो जाते हैं तो कभी सुखी हैं। प्रकृति कभी देती है तो कभी छीनती है। लेकिन मनुष्य बड़ा चालाक है। वह अच्छे परिवर्तन को तो सहर्ष स्वीकार कर लेता है। परंतु बुरे परिवर्तन के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। परन्तु प्रकृति कि नियम से "परिवर्तन ही जीवन है। साध्वी शीतलगुणाश्री ने कहा कि इंसान घर बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है फिर भी परेशान रहता है क्योंकि समय बदलता रहता है पर वह खुद को नहीं बदलता है। समय के हिसाब से खुद को बदलना सीखो। त्रिलोककुमार बोथरा ने बताया कि साध्वी के दर्शनार्थ करनूल संघ उपस्थित हुआ।

कल्पनाएं सदा साकार नहीं होती
बेंगलूरु. साध्वी डॉ.पदमकीर्ति ने कहा कि जीवन में आदमी सोचता कुछ है,होता कुछ है। व्यक्ति हमेशा अपने वर्तमान के आधार पर भविष्य की कल्पनाएं करता है। कल्पनाएं सदा साकार नहीं हुआ करती। सच तो यह है कि कल्पनाएं साकार होती ही नहीं है। एकाध कल्पना साकार हो जाने से आदमी अपने मन में भ्रम पाल लेता है कि मैं जो चाहूं, सो कर सकता हूं। यह उसका झूठा अहंकार है, जो उसे सिक्के के दूसरे पहलू को देखने नहीं देता। वह एक ही पहलू को देखे चला जाता है। सोचना तो व्यक्ति के हाथ में होता है। पर होना उसके हाथ में नहीं होता। होना प्रारब्ध के हाथ में है। जो हमें दिखाई नहीं देता। जो हमें ज्ञात नहीं है। पर होना निश्चित है। होने को टाला नहीं जा सकता। इसे टालने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए हमें सदैव होनी को अपनी नजरों के सामने रखना चाहिए।