
250 से अधिक तपस्वी वर्षीतप में जुड़े
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी एवं मुनि महापद्मसागर की निश्रा में ढाई सौ से अधिक तपस्वी विधि पूर्वक वर्षीतप की आराधना से जुड़े। इसमें आराधक लगभग साढ़े 13 महीने तक तप आराधना करते हैं। जिसकी शुरुआत मैसूर के महावीर भवन में हो चुकी है। बड़ी बात यह है कि इतने बड़े पैमाने पर संभवत: शहर में पहली बार ऐसा आयोजन हो रहा है। महावीर भवन में आदिनाथ जन्म कल्याणक महोत्सव से ही वर्षीतप की आराधना शुरू हुई थी। परंतु आचार्य ने शुभ दिन देखकर विधि पूर्वक सबको आराधना में प्रवेश करवाया। संपूर्ण आयोजन सुमतिनाथ जैन संघ ने ही किया है। संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि इस पूरी व्यवस्था को संभालने में संघ के सदस्य अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह आयोजन एक व्यक्ति के बस की बात नहीं है। लिहाजा, इस पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने में स्थानीय रहवासी मदद कर रहे हैं। आचार्य ने वर्षीतप की महत्ता के पर कहा कि भगवान आदिनाथ ने लगभग 400 दिवस की तपस्या के पश्चात पारणा किया था। यह लंबी तपस्या एक वर्ष से अधिक समय की थी अत: जैन धर्म में इसे वर्षीतप से संबोधित किया जाता है। आज भी जैन धर्मावलंबी वर्षीतप की आराधना कर अपने को धन्य समझते हैं, यह तपस्या प्रति वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरम्भ होती है और दूसरे वर्ष वैशाख के शुक्लपक्ष की अक्षय तृतीया के दिन पारायण कर पूर्ण की जाती है। तपस्या आरंभ करने से पूर्व इस बात का पूर्ण ध्यान रखा जाता है कि प्रति मास की चौदस को उपवास करना आवश्यक होता है। इस प्रकार का वर्षीतप करीबन 13 मास और दस दिन का हो जाता है। इसके प्राचीनत्व के मूल में कारण है क्योंकि यह पर्व आदिम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव से सम्बन्धित है जो कि स्वयं ही इसके करोड़ों वर्ष प्राचीनता का प्रमाण है। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव दीक्षोपरान्त मुनिमुद्रा धारण कर छह माह मौन साधना करने के बाद प्रथम आहारचर्या के लिए निकले।यहां ज्ञातव्य है कि तीर्थंकर क्षुधा वेदना को शान्त करने के लिये आहार को नहीं निकलते, अपितु लोक में आहार दान अथवा दान तीर्थ परम्परा का उपदेश देने के निमित्त से आहार चर्या के लिए निकलते हैं। अत: उचित विधि का अभाव होने से वे सात माह तक निराहार रहे। एक बार वे आहार चर्या के लिए हस्तिनापुर पहुंचे। उन्हें देखते ही राजा श्रेयांस को पूर्व भवस्मरण हो गया, और श्रेयांश राजा के हाथों भगवान ऋषभदेव ने चारित्र की वृद्धि तथा दानतीर्थ के प्रवर्तन के लिए अक्षय तृतीया के दिन पारणा की। अत: यह वर्षीतप अत्यन्त गौरवशाली है तथा राजा श्रेयांस द्वारा दानतीर्थ का प्रवर्तन कर हम सभी पर किए गए उपकार का स्मरण कराता है।
Published on:
08 Apr 2022 06:49 am
बड़ी खबरें
View Allबैंगलोर
कर्नाटक
ट्रेंडिंग
