
मातृभाषा मां के दूध के समान, इसका विकल्प नहीं : बंदोपाध्याय
बेंगलूरु. मातृभाषा मां के दूध के समान (mother tongue like mother's milk) होती है और मां के दूध की तरह इसका भी कोई विकल्प नहीं है। भाषा वरदान है क्योंकि यह किसी अन्य प्राणी के पास नहीं है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में हर राज्य का अपना योगदान और इतिहास रहा है। Hindi को रोजगार, शिक्षण व विज्ञान की भाषा बनाने की जरूरत है। कहीं-कहीं ऐसा हुआ भी है। लेकिन लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। अंग्रेजी की तरह अपनी भाषा को भी शक्तिशाली बना सकते हैं।
ये बातें बाबा साहब अंबेडकर विश्वविद्यालय कोलकाता एवं डायमंड हार्बर महिला विश्वविद्यालय की कुलपति Dr. Soma Bandopadhyay ने कही। वे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, साहित्य साधक मंच, बेंगलूरु, Karnataka राज्य विश्वविद्यालय कॉलेज हिंदी प्राध्यापक संघ एवं बिशप कॉटन वीमन्स क्रिश्चियन कॉलेज, बेंगलूरु के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी के विकास में कर्नाटक के योगदान विषय पर आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन संबोधित कर रही थी। उन्होंने कहा कि हिन्दी उनके लिए पालन-पोषण करने वाली भाषा है। हर भाषा का समृद्ध इतिहास और संस्कृति है। लड़ाई भाषा की नहीं है। भाषाओं के आदान-प्रदान की संस्कृति को भी लिपिबद्ध करना होगा। वे समझती हैं कि भारतवासियों के लिए हर प्रादेशिक भाषा उनकी मातृभाषा होती है। इसलिए कोई भाषा एक दूसरे से न तो आगे है, न पीछे। सबका समृद्ध साहित्य है। सांस्कृतिक परंपरा है।
क्या हम सिर्फ लेते ही रहेंगे
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं भाषाविद राहुल देव (Rahul Dev) ने कहा कि सिर्फ हिंदी नहीं, अन्य भाषाओं के विकास पर भी बात होनी चाहिए। जिस दिन हम देना शुरू करेंगे, अन्य भाषाओं के विकास में योगदान करेंगे, उसकी चिंता करेंगे, उससे प्रेम करेंगे और उसको आगे बढ़ाएंगे तो हमारी भाषा अपने आप ही आगे बढ़ेगी। जब तक हम यह नहीं करेंगे तब तक हिंदी को अन्य भाषाओं के विरोध का सामना करना पड़ेगा। हिंदी अन्य भाषाओं के लिए किस तरह उपयोगी हो सकती है। इस पर भी मंथन करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भाषा को लेकर विश्व भर में राजनीति होती है। भारत में कुछ ज्यादा है। भारत को बचाना है तो भारतीय भाषाओं को बचाना होगा। नहीं तो 50-60 वर्षों में देश का हर व्यक्ति शायद एक ही भाषा बोलेगा। भाषाओं को नहीं बचाएंगे तो भारतीयता नहीं बचेगी।
देव ने कहा कि अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के कारण विश्व की सभी भाषाओं को लेकर चिंता है। अकेले हिंदी प्रभावित नहीं है। जानकारी के अनुसार बीते 50 वर्षों में भारत की करीब 200 भाषाएं मर चुकी हैं। करीब 184 भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की प्रधान संपादक व कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि डॉ. अमिता दुबे, लाल बहादुर शास्त्री शिक्षा महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य व बीज वक्ता डॉ. इसपाक अली, साहित्य साधक मंच, बेंगलूरु के संस्थापक ज्ञानचंद मर्मज्ञ, बिशप कॉटन वीमन्स क्रिश्चियन कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. रेवीना रेबेका और हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार यादव ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
Updated on:
22 Feb 2023 06:23 pm
Published on:
22 Feb 2023 06:18 pm

बड़ी खबरें
View Allबैंगलोर
कर्नाटक
ट्रेंडिंग
