19 मई 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

नवकार मंत्र में है पंच परमेष्ठि

अनुष्ठान: सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम में हुई नवकार वंदनावली

2 min read
Google source verification
siddachal

नवकार मंत्र में है पंच परमेष्ठि

बेंगलूरु. सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम में आचार्य चंद्रयश सूरीश्वर व प्रवर्तक प्रवर कलापूर्ण विजय की निश्रा में मंगलवार को विविध स्तुति से नवकार वंदनावली का अद्भुत आयोजन हुआ। आचार्य ने नवकार की महिमा गाते हुए कहा कि पुण्य बंध और कर्म निर्जरा करने की श्रेष्ठतम आराधना नवकार मंत्र की है। जो व्यक्ति नवकार मंत्र का एक लाख बार जाप करता है वो अरिहंत पद पा सकता है। जो व्यक्ति नवकार मंत्र का नौ लाख बार जाप करता है उसे कभी नरक में नहीं जाना पड़ता है और जो नव करोड़ बार नवकार मंत्र का जाप करता है वह निश्चित तीसरे भव में मोक्ष प्राप्त करता है। नवकार मंत्र में पंच परमेष्ठि है।

आत्मा के सुरक्षा कवच हैं व्रत-नियम
बेंगलूरु. हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुमित्रा ने कहा कि धर्म ही संसार में रक्षक और सारभूत है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी शक्ति सामथ्र्य अनुसार अपने जीवन में कुछ न कुछ त्याग, प्रत्याख्यान व्रत, नियम जरूर अंगीकार करने चाहिए। व्रत नियम हमारी आत्मा के सुरक्षा कवच है। ज्ञान दर्शन, तप व्रत ही हमारी आत्मा को संयमित, पवित्र, निर्मल और कषाय रहित बनाते हैं। सभा में ट्रस्ट अध्यक्ष नेमीचंद खिंवेसरा, जैन कॉन्फ्रेंस के किरण गुलेच्छा, प्रांतीय चेयरमैन उत्तमरचंद बोहरा, हुक्मीचंद बाफना, पंजाब पंचकुला से भी दर्शनार्थी उपस्थित थे। संचालन संघ उपाध्यक्ष अशोक कुमार गादिया ने किया।

तीर्थंकर की आराधना करने से मिलती है मुक्ति
बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ शांतिनगर में आचार्य महेंद्र सागर सूरी ने कहा कि सर्वज्ञ तीर्थंकर भगवत की आज्ञा की आराधना करने से मुक्ति मिलती है। उनकी आज्ञा की विराधना करने से संसार में परिभ्रमण करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि तप की आराधना जिनाज्ञापूर्वक होती है। संयम की आराधना जिनाज्ञापूर्वक होती है। दान धर्म की आराधना जिनाज्ञापूर्वक होती है। जिनाज्ञा विरुद्ध भी सभी आराधना घास के तिनके इक_े करके बांधे हुए पूड़े के समान मामूली फल देने वाली होती है। जिनाज्ञा का उलंघन करने वाला सब आज्ञाओं को भंग करता है क्योंकि यदि जिनाज्ञा का ही भंग करता है तो वह जो आरधना कर रहा है वह किसकी आज्ञा से कर रहा है। बस अपनी मति से ही कर रहा है। अपनी मर्जी से आराधना करने वाले की सर्व आराधना जरा भी उसकी आत्मा के लिए फायदेमंद नहीं होती है।