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आशियाने में जगह नहीं, औलाद के हाथों रुसवाई

13 साल, 12 लाख कॉलहेल्पलाइन नंबर पर बुजुर्गों की व्यथा

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Kumar Jeevendra

Jun 13, 2015

not to open syan sadan for elderly

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बेंगलूरु.
जीवनभर की कमाई बच्चों के भविष्य पर खर्च कर दी। निजी नौकरी कर पाई-पाई जोड़कर जो पैसे इकट्ठे किए थे वे भी बेटे को दे दिए। अब मेरे पास कुछ नहीं है। फिर भी पुत्रवधु कहती है 'मंहगाई आसमान छू रही है, घर में रहना है तो खर्च में हाथ बंटाना होगा, वरना अपना इंतजाम कर लोÓ इकलौता बेटा है, वह भी उसकी सुनता है...। मैं कल भी रोती थी, जब बच्चा रोटी नहीं खाता था और आज भी रोती हूं जब बच्चा रोटी नहीं देता...। पढ़ लिखकर बच्चे कुछ बन जाएं, इसलिए एक कमरे के मकान में पांच बच्चों के साथ जिंदगी गुजार दी। आज पांच बच्चों के अलग-अलग घरों में मेरे लिए एक कमरा तक नहीं है...। बेटा और बहू जमीन-जायदाद उनके नाम करने के लिए प्रताडि़त करते हैं। मना करने पर कमरे में बंद कर देते हैं। कई दिन तक भोजन नहीं देते...।

गाल पर तमाचा

सिटी पुलिस और बुजुर्गों के हित के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठन नाइटिंगेल मेडिकल ट्रस्ट के तत्वावधान में चल रहे हेल्पलाइन नंबर पर मदद के लिए फोन करने वाले बुजुर्गों की यह पीड़ा हर उस बच्चे के गाल पर तमाचा है, जो आत्मनिर्भर बनाने वाले माता-पिता को बोझ समझ उनसे छुटकारा चाहते हैं। औलाद के हाथों रुसवाई झेलते बुजुर्गों की संख्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2002 में शुरुआत के बाद हेल्पलाइन पर 12,6,257 से ज्यादा वरिष्ठ नागरिकों ने मदद के लिए संपर्क किया है। 7,862 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 3978 मामलों का निपटारा भी हुआ।

हर दिन 40-45 कॉल्स

अकेलापन, बच्चों पर बोझ बनने की पीड़ा, अपमान और उपेक्षा बुजुर्गों को शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार कर रही है। हेल्पलाइन पर रोजाना 40-45 कॉल्स आते हैं। दो से तीन मामले बेहद गंभीर होते हैं। लोगों की आम शिकायत होती है कि उनके बच्चे उनके साथ समय नहीं बिताते, उन्हें घर की बेकार वस्तु की तरत समझते हैं। जमीन-जायदाद नाम करने के लिए सताएने के मामलों में बेतहाश वृद्धि हुई है। वर्ष 2013-14 में नाइटिंगेल मेडिकल ट्रस्ट की ओर से किए एक सर्वेक्षण में मदद के लिए फोन करने वाले लोगों में से 45 फीसदी से ज्यादा ने परिवार के लोगों द्वारा सताए या मारपीटकी शिकायत की। वर्ष 2012-13 में 28 फीसदी कॉलरों ने इस तरह की शिकायत की थी।

मानवता पर कलंक

पुलिस आयुक्त एम.एन.रेड्डी का कहना है कि बुजुर्गों का हर हाल में सम्मान होना चाहिए। बुजुर्ग आत्म सम्मान के साथ जीएं, यह सुनिश्चित करना सभी का कर्तव्य है। वर्ष 2002 में जब ट्रस्ट ने एल्डर्स हेल्पलाइन की शुरुआत की तो वे डीसीपी थे। देश में इस तरह की यह पहली हेल्पलाइन थी। बच्चों द्वारा बुजुर्गों के सताने के मामले मानवता पर कलंक हैं। उन्होंने सभी पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को हर हाल में बुजुर्गों से ढंग से पेश आने के आदेश दे रखे हैं।

अपनों के कारण चुप्पी

बच्चे ये भूल रहे हैं कि बुढ़ापा कोई रोग नहीं है। यह तो बस जीवन का एक ऐसा पड़ाव है जहां एक दिन हर किसी को ठहरना है। औलाद के हाथों रुसवाई झेलने के बावजूद अपनों की चिंता या फिर जागरूकता की कमी के कारण ज्यादातर बुजुर्ग खुद पर हो रहे जुल्म की शिकायत नहीं करते। कई बुजुर्गों को तो यह भी पता नहीं है कि कोई ऐसी हेल्पलाइन नंबर भी है जिस पर पर मुसीबत के वक्त फोन कर सहायता ली जा सकती है।

प्रेम कुमार, सह संस्थापक, नाइटिंगेल मेडिकल ट्रस्ट

कानूनी ज्यादतियों का भी सामना

आज देश में बुजुर्ग दयनीय और उपेक्षित जीवन जीने को मजबूर हैं। बुजुर्ग सिर्फ अपनों की उपेक्षा, मानसिक-आर्थिक तनाव ही नहीं झेलते बल्कि उन्हें कानूनी ज्यादतियों का भी सामना करना पड़ता है। बुजुर्गों को अपने ही आशियाने में जगह नहीं मिलती। ज्यादातर देखा जाता है कि इस उम्र में बुजुर्गों को अलग-थलग घर के एक कमरे में या फिर बरामदे में अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। अकेलेपन और मानसिक तनाव के कारण वे बड़बड़ाने लगते हैं। दीवारों से बाते करने लगते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, बचपन लौट आता है। वे बच्चों जैसी हरकतें भी करते हैं।

मीना जैन,पूर्व अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति (बेंगलूरु शहर)

हेल्पलाइन 1090 पर कॉल करें

हेल्प एज इंडिया के हर साल आने वाले सर्वेक्षण के तथ्य भयावहता की तस्वीर पेश करते हैं। जिन मां-बाप ने अपने बच्चे को अंगुली थामकर चलना सिखाया, उन्हें अपने ही बच्चों से हक के लिए लडऩा पड़ता है। हेल्पलाइन 1090 पर कॉल कर बुजुर्ग मदद ले सकते हैं। हेल्पलाइन के माध्यम से उपलब्ध सभी सेवाएं नि:शुल्क हैं।

डॉ.राधाएस.मूर्ति,प्रबंध न्यासी, नाइटिंगेल मेडिकल ट्रस्ट

ठीक नहीं बेंगलूरु की रिपोर्ट

  1. हेल्प एज इंडिया की ओर से बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचार विषयक रिपोर्ट-2014 के अनुसार देश में बुजुर्ग अत्याचार का आंकड़ा 23 से बढ़कर 50 फीसदी से ज्यादा हो गया है। इनमें 53 फीसदी पीडि़त महिलाएं भी हैं।
  2. मेट्रो शहरों में एल्डर्स अब्यूज मामलों में 75 फीसदी के साथ आईटी सिटी बेंगलूरु शीर्ष पर है।
  3. 60 फीसदी के साथ कोलकाता दूसरे, 53 फीसदी के साथ चेन्नई तीसरे, 40 फीसदी के साथ हैदराबाद चौथे, 38 फीसदी के साथ मुम्बई पांचवें और 22 फीसदी के साथ दिल्ली छठे स्थान पर है।
  4. टायर टू शहरों की बात करें तो 85 फीसदी मामलों के साथ नागपुर पहले और 13 फीसदी मामलों के साथ कानपुर अंतिम पायदान पर है।
  5. हेल्प एज इंडिया के ही 2012 में जारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 23 फीसदी बुजुर्ग अपने ही बच्चों के हाथों पीडि़त हैं। ज्यादातर मां-बाप अपने बहू-बेटे से प्रताडि़त हैं। और तो और बेटियां भी अपने मां-बाप पर अत्याचार करने में पीछे नहीं हैं।