
बेंगलूरु. कावेरी जल विवाद को लेकर शीर्ष अदालत के फैसले से ना किसी की जीत हुई है ना किसी की हार। मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या ने यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कावेरी पंचाट के अंतिम फैसले में कर्नाटक के साथ हुए अन्याय को दूर करने के लिए शीर्ष अदालत में पंचाट के फैसले को चुनौती दी गई थी।
इस याचिका की सुनवाई के दौरान कर्नाटक ने तमिलनाडु में 20 टीएमसी पानी उपलब्ध होने का तर्क दिया था लेकिन शीर्ष अदालत ने उसे खारिज करते हुए तमिलनाडु में 10 टीएमसी पानी उपलब्ध होने की बात कही है। इसके कारण तमिलनाडु को आपूर्ति किए जाने वाले पानी की मात्रा में 10 टीएमसी की कटौती हुई है।
इसके अलावा शीर्ष अदालत ने बेंगलूरु शहर की प्यास बुझाने के लिए अतिरिक्त 4.75 टीएमसी पानी आपूर्ति की अनुमति दी है। इस फैसले से कर्नाटक को 14.75 टीएमसी पानी अतिरिक्त मिलेगा। उन्होंने कहा कि किसी को भी इस फैसले को कर्नाटक की जीत या हार के रूप में प्रचारित नहीं करना चाहिए।
शीर्ष अदालत के फैसले का हम सबको सम्मान करना होगा। जब कावेरी जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं होगा, तब अदालत के आदेश का पालन करने संबंधी सवाल पर मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी विशेष स्थिति में पानी के बंटवारे के अलग दिशा-निर्देश होंगे जिसका सभी को पालन करना होगा।
बोर्ड के गठन पर संशय
पंचाट के आदेश मुताबिक राज्यों के बीच पानी का बंटवारा सुनिश्चित करने के लिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड का गठन किया जाना था लेकिन शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को दिए आदेश में बोर्ड के गठन का फैसला केंद्र पर छोड़ दिया। हालांकि, पीठ ने १८९२ और १९२४ के जल बंटवारा समझौते को असंवैधानिक मानने से इनकार कर दिया लेकिन कहा कि १९२४ का समझौता ५० साल की अवधि के बाद १९७४ में निष्प्रभावी हो गया था।
अदालत ने आजादी और राज्य पुनर्गठन के बाद भी इन समझौते पर आपत्ति नहीं जताने पर सवाल उठाया। पीठ ने केंद्र सरकार को छह सप्ताह में ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए कहा कि राज्यों के बीच पानी का बंटवारा आदेश के मुताबिक हो सके। पीठ ने राज्यों को आवंटित कार्य के लिए ही पानी का उपयोग करने आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने पानी छोडऩे के मासिक कोटे का भी पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा। शीर्ष अदालत ने वर्ष २०१३ में मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या, सिंचाई मंत्री एम.बी.पाटिल की ओर से दायर अवमानना याचिका भी खारिज कर दी।
तमिलनाडु के नेताओं का कहना है कि शीर्ष अदालत ने पंचाट के आदेश के मुताबिक बोर्ड के गठन का आदेश दिया है। हालांकि, कर्नाटक के वकील मोहन करतगी ने कहा कि अदालत ने पंचाट की सिफारिश के मुताबिक असीमित अधिकार वाले बोर्ड के बजाय अंतर राज्यीय जल विवाद कानून की धारा ६ के तहत निकाय बनाने को कहा है, जिसके अधिकारों का फैसला केंद्र सरकार को करना है। बोर्ड पर असमंजस के कारण किसानों और कन्नड़ संगठनों में भी संशय की स्थिति बनी रही।
Published on:
17 Feb 2018 10:41 pm
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