कर्नाटक विधान परिषद सदस्य के. विवेकानंद ने कहा, तीसरी भाषा केवल हिंदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मराठी, तेलुगु, उर्दू और संस्कृत जैसी भाषाएं भी शामिल हैं। एसएसएलसी परीक्षा के दौरान इस तरह का फैसला पूरी तरह अनुचित है। छात्रों की सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या को लिखे पत्र में उन्होंने बताया कि सरकारी और निजी स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षक तीसरी भाषा पढ़ाते हैं।विवेकानंद ने कहा कि कई भाषाओं का ज्ञान छात्रों के संवाद कौशल को मजबूत करता है और उनके पेशेवर जीवन में भी मददगार होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि तीसरी भाषा के महत्व को कम करने से छात्रों की भाषाई दक्षता कमजोर हो सकती है और विविधता की भावना पर भी असर पड़ेगा। सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।