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महादयी वन्यजीव अभयारण्य को लेकर कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक घमासान

गोवा सरकार ने हाइ कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का किया निर्णय, कांग्रेस का आरोप है कि इससे महादयी नदी मामले को लेकर राज्‍य की लड़ाई होगी कमजोर

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बेंगलूरु. गोवा सरकार ने महादयी वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के क्षेत्रों को बाघ अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने संबंधी बॉम्बे हाइ कोर्ट के आदेश को चुनौती देने का फैसला किया है लेकिन इसका राज्‍य में विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि बाघ अभयारण्य पर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने का फैसला महादयी नदी मामले को कमजोर करेगा।

गोवा ने पहले ही कर्नाटक और महाराष्ट्र के साथ महादयी नदी के पानी के बंटवारे पर बने अंतरराज्य जल विवाद न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती दे रखी है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा पीठ ने 24 जुलाई को राज्य सरकार को महादयी वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के क्षेत्रों को बाघ अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने और तीन महीने के भीतर अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया था।

उच्च न्यायालय के आदेश के बाद, गोवा के वन मंत्री विश्वजीत राणे ने कहा कि राज्य सरकार फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने सहित सभी विकल्प तलाश रही है।

गोवा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमित पाटकर ने यहां कहा कि अगर हमें महादयी नदी को बचाना है तो देखें कि उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया वह वास्तव में हमारे पक्ष में था। लेकिन हम जो देख रहे हैं वह बिल्कुल विपरीत है। उच्च न्यायालय के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने से महादयी नदी को बचाने का राज्य का मामला कमजोर हो जाएगा।

पाटकर ने आगे आरोप लगाया कि बाघ अभयारण्य घोषित करने पर वनवासियों के विस्थापन के बारे में गलत आशंकाएं फैलाई जा रही हैं। गलत दावे किए जा रहे हैं कि अगर क्षेत्र को बाघ अभयारण्य घोषित किया गया तो 10,000 से 15,000 लोग विस्थापित हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि अदालत ने अपने फैसले में वनवासियों के अधिकारों की रक्षा की है।

पाटकर ने कहा, वन विभाग ने पहले ही कई क्षेत्रों को बाघ आरक्षित योजना से बाहर कर दिया है। उन्होंने उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वन अधिकारियों को यह सूचित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाना चाहिए कि बाघ अभयारण्य अधिसूचित होने के बाद आदिवासियों के हित प्रभावित नहीं होंगे।

कांग्रेस नेता ने कहा, अदालत ने उल्लेख किया है कि बाघ अभयारण्य के लिए प्रस्तुत योजना में पहले से ही बसे हुए क्षेत्रों को बाहर रखा गया है और अनुसूचित जनजातियों और अन्य वनवासियों के अधिकारों का सम्मान किया गया है। जनजातियों और अन्य वनवासियों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।