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त्याग कोई पदार्थ या वस्तु नहीं : कोठारी

त्याग कोई पदार्थ या वस्तु नहीं है, इसे उचित संदर्भ में समझना होगा। त्याग कहने में आसान है लेकिन यह मनुष्य के जीवन से भी अधिक दुर्लभ है

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Dr. Gulab Kothari

बेंगलूरु. त्याग कोई पदार्थ या वस्तु नहीं है, इसे उचित संदर्भ में समझना होगा। त्याग कहने में आसान है लेकिन यह मनुष्य के जीवन से भी अधिक दुर्लभ है। अखिल भारतीय जैन मंच (बेंगलूरु) की ओर से यहां रविवार को आयोजित अभिनंदन समारोह में गृहस्थ जीवन त्यागकर संन्यास का मार्ग अपनाने वाले जैन संप्रदाय के दीक्षार्थियों के परिजनों का अभिनंदन करते हुए राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान संपादक डॉ गुलाब कोठारी ने कहा कि उन्हें लगता है कि दीक्षार्थियों से कहीं अधिक बड़ा त्याग उनके परिजनों ने किया है।

दीक्षा लेने वाला तो खुद कल्याण के मार्ग पर जाता है लेकिन वह अपने साथ परिजनों के जीवन और सपनों का एक हिस्सा भी ले जाता है। फिर भी गृहस्थ जीवन जीने वाला परिजन उस दीक्षार्थी की ताकत बन रहा है और उसके संकल्पों को बलवान बना रहा है। यह ठीक है कि दीक्षार्थी समाज, धर्म और देश के लिए जा रहा है, लेकिन वह अपने साथ घर की आत्मा का एक हिस्सा लेकर जा रहा है।

इसलिए त्याग को एक वस्तु या पदार्थ मानकर नहीं समझ सकते। उन्होंने कहा कि ‘हम सबकुछ अपनी मुट्ठी में बांध कर रखना चाहते हैं।’ यह मन में उठने वाली इच्छाओं और कामनाओं के कारण है। अगर हमारे मन में इच्छाएं जन्म नहीं ले तो शरीर काम नहीं करेगा। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए लिए दौड़-भाग करतेे हैं। त्याग को भी उसी संदर्भ में समझना पड़ेगा।


उन्होंने कहा कि आखिर कामनाओं या माया का, वह कौन सा फैलाव है जिसने हमको बांध कर रखा है और क्या कारण है कि मन इससे छिटककर भागने को भी उतावला है। इन दोनों बातों को एक जगह रखकर समझना होगा क्योंकि कामनाएं बंधन का भी कारण हैं और कामनाएं मोक्ष का भी मार्ग हैं।

जब मन किसी पदार्थ पर अटक जाए, एकाग्र हो जाए तो वहीं से बंधन शुरू हो जाता है। इसलिए धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य ही विद्या का मार्ग है। यही विद्या हमें मुक्ति का मार्ग दिखाता है। जिसने दीक्षा लेने का संकल्प कर लिया वह इस बात को जल्दी समझ गया। त्याग छोडऩे का नाम है। त्याग के एक छोर पर संन्यास है और दूसरे छोर पर प्रेम है। जब प्रेम का स्वरूप नि:स्वार्थ हो जाए तो वह कांति है और वहीं जीवन की असली अभिव्यक्ति है।

समर्पण के लिए संकल्प जरूरी
कोठारी ने कहा, त्याग वह है जो कामनाओं की पूर्ति के लिए सांसारिक और गृहस्थ जीवन जीते हुए भी अपनी परिभाषा ढूंढ ले, समझ ले और उसे अपना ले। भोग व त्याग के बीच में एक संतुलन बना सके। सभी धर्मों का अर्थ यही है कि त्याग भी बनाए रखें और भोग भी बनाए रखें। भोग को भी त्याग समझकर करें, लेकिन, अगर मन मेंं समर्पण का भाव नहीं है तो त्याग भी संभव नहीं है।

समर्पण के लिए संकल्प जरूरी है और संकल्प में कहीं विकल्प की गुंजाइश नहीं होती। जब तक संकल्प दृढ़ नहीं होगा सफलता नहीं मिलेगी। उन्होंने बीज का उदाहरण देते हुए कहा कि जब एक बीज खुद को जमीन में गाड़ देने का संकल्प करता है तो एक बड़ा पेड़ बनकर राहगीरों को छाया प्रदान करता है। अगर उसे फ्रिज में रख दें तो वह खुद अपना जीवन व्यतीत कर लेगा लेकिन छायादार वृक्ष नहीं बन पाएगा। यह बीज उस संकल्प को बलवान बनाने, समाज और देश के लिए जीने की प्रेरणा देता है।

१०७ वीर परिवारों के मुखियाओं का अभिनंदन
समारोह में सकल जैन समाज के श्वेताम्बर, स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ एवं दिगम्बर सम्प्रदाय में दीक्षित साधु-साध्वी वृंद के १०७ सांसारिक वीर परिवारों के मुखियाओं का अभिनंदन किया गया। इस मौके पर अतिथियों ने इन परिवारों की निर्देशिका का भी विमोचन किया। इस पुस्तक में उन सभी परिवारों का विवरण दिया गया है जिनके परिवार से लोग दीक्षित हुए। पुस्तक सम्मानित होने वाले परिवारों को भी प्रदान किया गया। इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत देवीलाल पितलिया के मंगलाचरण से हुई।

कार्यक्रम का उद्घाटन महेंद्र मुणोत और मुख्य व विशिष्ट अतिथियों ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता देवीलाल सुखलेचा ने की। समारोह में कोठारी के अलावा मुख्य अतिथि भामाशाह मीठालाल मांडोत, अखिल भारतीय सुधर्म जैन श्रावक संघ के पूर्व महामंत्री ज्ञानराज मेहता, साहित्यकार मनोहर भारती, धर्माध्यापक प्रकाशचंद पटवा, कर्नाटक जैन स्वाध्याय संघ के संयोजक शांतिलाल बोहरा, लालचंद छिंगावत, अरविंद मांडोत, पुखराज दक, पुखराज मेहता ने भी विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर समाजसेवी इंदरचंद भंसाली भी उपस्थित थे।