
एकमात्र आत्मशुद्धि का पर्व है संवत्सरी-साध्वी सुमित्रा
बेंगलूरु. राजाजीनगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी सुमित्रा के सान्निध्य में साध्वी डॉ. सुप्रिया ने पर्युषण महापर्व के आठवें दिवस कहा कि जैन धर्म और संस्कृति में संवत्सरी को महापर्व की संज्ञा दी गई है और इसे एक आध्यात्मिक पर्व माना गया है। महापर्व संवत्सरी का पावन दिन सबके लिए एक विशेष प्रेरणा लेकर आता है। यह दिन वास्तव में प्रतिक्रमण, आत्म-निरीक्षण, आत्म-परीक्षण का दिन है। आलोचना से हमारे भवों-भवों के संचित कर्म क्षय होते हैं। यह एकमात्र आत्मशुद्धि का पर्व है, इसलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है। संवत्सरी अंतरात्मा की आराधना का पर्व है, आत्मशोधन का पर्व है। पर्युषण पर्व के इस आठवें दिवस संवत्सरी पर्व को क्षमापना दिवस भी कहा जाता है। क्षमा का क्ष यानी जिसमें समता भाव है और मा यानी मान को गलाने की जिसमें क्षमता है उसे क्षमा पर्व कहते हंै। इसके पूर्व साध्वी सुदीप्ति ने कहा कि "खामेमी सव्वे जीवा" यानि सभी जीवों को मैं क्षमा करता हूं। जिसके मन में सरलता होती है, जिसका अभिमान शांत हो गया है वही क्षमा की मांग कर सकता है। क्षमा करने से लोभ, मान और माया का क्षय हो जाता है।
दोपहर में आलोयणा का आयोजन रहा। नेमीचंद दलाल ने बताया कि साध्वी सुमित्रा की निश्रा एवं प्रेरणा से पर्युषण महापर्व के विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ तपस्या का दौर गतिमान है। 30 श्रावक-श्राविकाओं ने अ_ाई के, 25 तपस्वियों ने तेले के एवं अनेक ने सावन भादो के एकांतर तप, उपवास, आयंबिल के प्रत्याख्यान लिए। विशेष तपस्या में 7 वर्षीय बालक यश डागा
ने भी 8 उपवास के प्रत्याख्यान तथा 4 वर्षीय प्रिशा टोडरवाल और धृति टोडरवाल ने आठवें बियासना का प्रत्याख्यान लिया। गौतम मेहता ने जैन युवा संगठन द्वारा विश्व शांति एवं आत्मशुद्धि के लिए 16 सितम्बर से आयोजित होने वाले 9 करोड़ नवकार महामंत्र जाप की विस्तृत जानकारी दी। आगामी आयोजन की कड़ी में साध्वी वृंद के सान्निध्य में आत्म-शुक्ल -शिव जन्मोत्सव का चार दिवसीय आयोजन 16 सितम्बर से शुरू होगा।
Published on:
11 Sept 2021 07:57 pm
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