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धर्म आराधना से क्या परिणाम प्राप्त हो रहा है, यह देखें

सभा में आशा श्रीश्रीमाल ने 9 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए
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बैंगलोर

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Ram Naresh Gautam

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Updated: 30 Aug 2018, 5:36 PM IST

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धर्म आराधना से क्या परिणाम प्राप्त हो रहा है, यह देखें

बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में महावीर धर्मशाला में जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि व्यक्ति को परिमाणदर्शी नहीं, परिणामदर्शी बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्माराधना कितने परिमाण में की जा रही है, यह देखने के बजाय उस धर्माराधना से क्या परिणाम प्राप्त हो रहा है, यह देखा जाना चाहिए। जो व्यक्ति कार्य करने से पूर्व ही उसके परिणाम का चिंतन कर लेता है उसे बाद में पछताने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। सभा में आशा श्रीश्रीमाल ने 9 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। उनका बहु मंडल व संघ की ओर से सम्मान किया गया।


हर जीव को सुख पसंद, दुख नहीं
जिनकुशल सूरी जैन आराधना भवन, बसवनगुड़ी में साध्वी प्रियरंजना ने कहा कि हर जीव को सुख पसंद है, पर दुख किसी को भी नहीं। उन्होंने कहा कि आप दूसरों को सुख देंगे तो स्वयं सुखी होंगे। दूसरे को दुख देंगें तो स्वयं दुखी होंगे। व्यक्ति स्वयं जितना दुखी नहीं होता उससे ज्यादा दुखी दूसरों के सुखों को देखकर हो जाता है। दूसरों के सुख हमको अच्छे नहीं लगते। ईष्र्या के भाव हमें दुखी बना देते हैं। शारीरिक दुख उतना दुख नही ंदेता जितना दुख हमारे पाप से उत्पन्न होता है। पाप जनित दुख हमारे स्वयं बोए बीजों का परिणाम है। अन्य दुख, दुख तो हंै परंतु क्षणिक होता है। उसे सहन करने में नाममात्र का कष्ट है।

तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के जीवन चरित्र का वाचन
हिरियूर (चित्रदुर्गा). राजेन्द्र भवन में आचार्य कीर्तिप्रभ सूरीश्वर के सान्निध्य में मुनि तपप्रभ विजय एवं मुनि संयमप्रभ विजय ने प्रवचन में तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के जीवन चरित्र का वाचन किया। मुनि संयमप्रभ ने कहा कि तीर्थंकर के साथ अशोक वृक्ष, छत्र, भामण्डल, चामर, दिव्य-ध्वनि, देव-दुंदुभि, स्फटिक सिंहासन आदि साथ-साथ चलते हैं और उनके देशना में सभी प्रकार के मनुष्य, देव, तिर्यंच आदि अपनी-अपनी भाषा में प्रभु की वाणी सुनते हैं। जब भगवान चलते हैं, तो रास्ते मे पड़े कांटे भी उल्टे हो जाते हैं। यानी उन्हें भी इस बात का सात्विक गर्व होता है और वे भी मानो भगवान को वन्दन करते हैं।