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‘मोटर दुर्घटना के दावे परिवार तक सीमित नहीं, संस्थाएं भी मुआवजे की हकदार’, कर्नाटक हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

मोटर दुर्घटना के दावों पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। क्या है यह फैसला? आइए नज़र डालते हैं।
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Karnataka High Court

Karnataka High Court (File Photo)

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा कानून की व्याख्या को व्यापक करते हुए अहम फैसला दिया है कि मुआवजे का दावा सिर्फ मृतक के जैविक परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं को भी इसका अधिकार है जो मृतक पर निर्भर थीं। जस्टिस सूरज गोविंदराज और जस्टिस त्यागराज एन. इनावल्ली की बेंच ने 2011 के एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया, जिसमें जीप और ट्रक की आमने-सामने टक्कर में एक मठ के स्वामी की मृत्यु हो गई थी।

आश्रितता के नुकसान का दावा किया था खारिज

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) ने पहले सिर्फ संपत्ति नुकसान और अंतिम संस्कार के लिए 1.2 लाख रूपए का मुआवजा दिया था और ‘आश्रितता के नुकसान’ का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक का कोई पारिवारिक आश्रित नहीं था। हाईकोर्ट ने इसे संकीर्ण दृष्टिकोण बताते हुए कहा कि आश्रितता सिर्फ पारिवारिक नहीं, बल्कि आर्थिक और कार्यात्मक भी हो सकती है।

कोर्ट ने बदला फैसला

कोर्ट ने माना कि मठाधिपति संस्था का प्रतिनिधि होता है और उसकी सेवाओं से संस्था को लाभ मिलता है, इसलिए उसकी मृत्यु से संस्था को वास्तविक नुकसान होता है। सुप्रीम कोर्ट के ‘मोंटफोर्ड ब्रदर्स’ मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने मठ को 5.94 लाख रूपए मुआवजा देने और बढ़ी हुई 4.74 लाख रूपए राशि पर 6% ब्याज देने का आदेश दिया।

संस्थागत आश्रितता को मान्यता

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकरण ने आश्रितता की गलत व्याख्या कर इसे केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित रखा। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा कानून का उद्देश्य व्यापक है, जिसमें संस्थागत निर्भरता भी शामिल है। बीमा कंपनी को 4 हफ्ते में राशि जमा करने का निर्देश दिया गया।