
कुमार जीवेंद्र झा
बेंगलूरु. देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर है मगर सरकारी स्कूल सुविधाओं और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की कवायद के बीच देश भर के स्कूलों में रिक्त शिक्षकों के 11 लाख से अधिक पद बड़ी चुनौती साबित हो रहे हैं। देश में स्कूलों की स्थिति पर पिछले पखावाड़े जारी हुई यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों में शिक्षकों के 11.16 लाख से अधिक पद रिक्त हैं। 19 प्रतिशत स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। पिछले साल लोकसभा में दिए गए बयान में केंद्र सरकार ने देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के स्वीकृत 61.84 लाख पदों में से 10.10 लाख (17.14 फीसदी) रिक्त होने की बात कही थी।
देहाती इलाकों में 69 प्रतिशत रिक्त पद
यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षकों के रिक्त पदों में से 69 प्रतिशत पद ग्रामीण इलाकों में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल में शिक्षकों की संख्या में करीब 5 लाख की वृद्धि हुई मगर यह अभी भी अपर्याप्त है। वर्ष 2018-19 में देश के 16 लाख से अधिक सरकारी स्कूलों में 94 लाख शिक्षक कार्यरत हैं जबकि वर्ष 2013-14 में यह संख्या 89 लाख थी। रिपोर्ट में शिक्षकों को बेहतर पारिश्रमिक और नौकरी सुरक्षा देने की सिफारिश की गई है।
एक दशक में सीमित स्थाई भर्ती
रिपोर्ट के मुताबिक संविदा या अस्थाई नियुक्तियों वाले शिक्षकों में जिम्मेदारी का भाव कम होता है। संविदा पर भर्ती शिक्षकों में से एक बड़ी संख्या में पेशेवर कौशल की कमी है और वे कम मानदेय पर काम कर रहे हैं, जिसका असर भी शिक्षा पर पड़ रहा है। कई राज्यों में शिक्षकों की योग्यता और नियुक्ति संबंधी नियमों में बार-बार बदलाव होते हैं जबकि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में इसे लेकर नियम ज्यादा स्पष्ट हैं।
तकनीकी संसाधनों की भी कमी
कोरोना महामारी ने शिक्षा में तकनीक के अनुप्रयोग को भी रेखांकित किया। मगर 22 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में ही कंप्यूटर उपलब्ध हैं और उनमें से 19 प्रतिशत में ही इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक सकल दाखिला (जीइआर) अनुपात में पिछले दो दशकों के दौरान सुधार आया है।
अस्थायी नियुक्ति अल्पकालिक समाधान, प्रशिक्षण मिले
शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए शिक्षा मित्र जैसी अस्थाई भर्ती सिर्फ अल्पकालिक समाधान है। नियुक्ति और प्रशिक्षण, दोनों पर निवेश किया जाना चाहिए। अस्थायी तौर नियुक्त शिक्षकों को भी नियमित अंतराल पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे प्रभावी तरीके से अध्यापन कर सकें। अस्थाई नियुक्तियों में भी दीर्घता होनी चाहिए। इससे समर्पण भाव बढ़ेगा। कई मामलों में सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन अच्छा है। जरूरत है सिर्फ पेशेवर तरीके से व्यवस्थित करने की। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए पर्याप्त और पात्र शिक्षकों की जरूरत है। एनइपी में इसे लेकर भी प्रावधान हैं।
- डॉ ए. सेंथिल कुमारन, वरिष्ठ शिक्षाविद्
संसाधन और सुविधाएं बेहतर हों
ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूल आज भी शिक्षा के स्त्रोत हैं। शहरों में भी गरीबों के लिए सहारा हैं। अगर संसाधन और सुविधाएं बेहतर हों तो इन स्कूलों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और यह निजी स्कूलों को टक्कर देंगे। निजी शिक्षण संस्थानों में अस्थाई नियुक्ति आज चलन सा बन गया है। पात्र शिक्षकों की भर्ती के साथ ही उन्हें बेहतर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। अस्थाई शिक्षकों के लिए भी रोजगार में स्थायित्व हो और बेहतर मानदेय होना चाहिए।
- प्रो. विनय कुमार यादव, शिक्षाविद्
Published on:
29 Oct 2021 01:41 am
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