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आत्मनिर्भरता का मतलब है-आत्मावलंबन व आत्मविश्वास

आचार्य देवेन्द्र सागर के ऑनलाइन प्रवचन

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आत्मनिर्भरता का मतलब है-आत्मावलंबन व आत्मविश्वास

आत्मनिर्भरता का मतलब है-आत्मावलंबन व आत्मविश्वास

बेंगलूरु. राजाजीनगर में ऑनलाइन प्रवचन के माध्यम से आचार्य देवेंद्रसागरसूरि ने कहा की बात जब आत्मनिर्भरता की हो रही है तो क्यों न हम प्रसन्नता के मामले मे भी आत्मनिर्भर बनने के बारे मे सोचें। शाब्दिक अर्थ के हिसाब से आत्मनिर्भरता का मतलब है-आत्मावलंबन, आत्मविश्वास अर्थात बिना किसी बाहरी सहायता के अपना जीवन अपने बूते जीना। आचार्य ने कहा कि किसी व्यक्ति को खुशी दो प्रकार से हासिल हो सकती है। एक तो भौतिक साधन-संसाधनों द्वारा और दूसरी आध्यात्मिकता के जरिए प्राप्त आत्मिक शांति से। इनमें से पहली खुशी बाहरी साधनों पर निर्भर है, और दूसरी कुदरत द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से दिए गए आंतरिक साधनों द्वारा प्राप्त की जा सकती है। इसलिए जो कोई खुशी के मामले में आत्मनिर्भर होना चाहता है, उसे बाहरी सुख-सुविधाओं की बजाय अपने अंदर स्थित साधनों की ओर उन्मुख होना होगा। इसमें उसकी सहायता आध्यात्मिकता ही कर सकती है। अक्सर व्यक्ति खुश रहने के लिए भौतिक साधनों के पीछे भागता दिखाई पड़ता है और जैसे-जैसे उसे ये साधन मिलते जाते हैं, वैसे-वैसे वह खुश भी होता दिखाई पड़ता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भौतिक साधन व्यक्ति को एकबारगी खुशी तो अवश्य देते हैं, लेकिन समझना यह भी चाहिए कि बाहरी साधनों पर निर्भर खुशी कदापि टिकाऊ नहीं हो सकती। भौतिक साधन केवल बाहरी खुशी ही दे सकते हैं और यह खुशी तब तक ही बनी रहती है, जब तक कि बाहरी साधन मौजूद रहते हैं। ऐसे में बाहरी साधनों के पीछे दौड़ लगाने वाला व्यक्ति अंत में पराधीन बन जाता है और पराधीन व्यक्ति की खुशी भी पराश्रित हो जाती है, जो शाश्वत न होकर सशर्त होती है। यह खुशी तब तक ही बनी रहती है, जब तक कि इसके लिए आवश्यक भौतिक साधनों की बाहरी पूर्ति होती रहती है। ऐसी खुशी या प्रसन्नता आत्मनिर्भर कैसे हो सकती है? इसलिए आज जब देश भौतिक उत्पादों के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर जाने के बारे में सोच रहा है, तो हमें भी प्रसन्नता के मामले में आत्मनिर्भरता होने के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता ही वह मार्ग है जो हमारी प्रसन्नता को स्वावलंबी बनाने की क्षमता रखती है। आध्यात्मिकता हमे अंतर्मुखी होना सिखाती है, और खुशी के लिए भी बाहरी कारकों के बजाय अंदरूनी कारकों पर निर्भर रहना सिखाती है। आत्मकेंद्रित तत्वों पर आधारित खुशी शाश्वत होने के कारण जीवनपर्यंत चलती है। इस मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भौतिक साधनों को साध्य न समझकर साधन मात्र मानता है, उसके जीवन में इनकी अहमियत एक स्तर पर अक्सर समाप्त हो जाती है और वह जल्दी ही संतुष्टि को अंगीकार कर लेता है। इसलिए स्थायी और टिकाऊ प्रसन्नता के लिए हमें बाहर की ओर देखने के बजाय अपने अंतर्मन की ओर उन्मुख होना चाहिए और भौतिकता के बजाय आध्यात्मिकता का अवलंबन करना चाहिए।