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वरिष्ठ अभिनेता विजय खरे का झलका दर्द , भोजपुरी फिल्मों में परोसी जा रही फूहड़ता

जिन्हें लोक कला का ज्ञान नहीं, वे बना रहे फिल्में, फिल्मों से गायब हो गई माटी की सुगंध

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वरिष्ठ अभिनेता विजय खरे का झलका दर्द , भोजपुरी फिल्मों में परोसी जा रही फूहड़ता

bhojpuri film actor vijay khare

राजीव मिश्रा
बेंगलूरु. भोजपुरी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता विजय खरे आज के दौर की भोजपुरी फिल्मों में परोसी जा रही फूहड़ता से आहत हैं। उनका मानना है कि भोजपुरी फिल्मों में अब माटी की सुगंध नहीं रही। आंचलिकता कहीं गायब हो गई है। वैसे लोग भोजपुरी फिल्में बना रहे हैं जिन्हें लोककला का ज्ञान नहीं और यह इंडस्ट्री भाग्य भरोसे चल रही है।

हाल ही में लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित विजय खरे बेंगलूरु प्रवास पर आए तो पत्रिका से खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि अब उनका रुख राजस्थान की ओर हो चुका है। वहीं, बिहार में भोजपुरी की बजाय बज्जिका भाषा में फिल्में बनाना चाहते हैं। राजस्थान के पाली में उनकी फिल्म ‘तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस’ की शूटिंग हो रही है। वहीं, बिहार के मुज्जफ्फरपुर और सीतामढ़ी सहित जिन जिलों में बज्जिका भाषा लोकप्रिय है वहां इसी भाषा में फिल्में बना रहे हैं।

अश्लीलता बढऩे से दूर हुई महिला दर्शक
उन्होंने कहा कि पहले औरतें बैलगाड़ी में बैठकर भोजपुरी फिल्में देखने आती थीं। लेकिन, अश्लीलता ऐसी बढ़ी कि औरतें सिनेमा हॉल में नहीं आतीं। वे फिर उन्हें सिनेमा हॉल तक लाना चाहते हैं। आजकल जो भोजपुरी फिल्में बन रही हैं उनमें ना तो संवाद है और ना ही गाने जो मन को छू ले। पहले के भोजपुरी गानों में रस होता था। पर आज का गीत-संगीत सुनकर बेहद अफसोस होता है। गाने बदल गए हैं, माहौल बदल गया है। इंडस्ट्री की हालत देखकर वे शर्मिंदा हैं।

उन्होंने भोजपुरी को सींचा और एक पहचान दिलाई। लेकिन अब तकलीफ होती है कि इसमें से माटी का सुगंध गायब हो गई है। उन्होंने कहा कि भोजपुरी फिल्मों की शूटिंग पहले कलकत्ता (अब कोलकाता), यूपी और बिहार में होती थी। अब लंदन में होती है। क्या लंदन में भोजपुरी कल्चर मिलेगा?

ऐसे बन गए थे खलनायक
वर्ष 1984 में ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ फिल्म में भीमा के किरदार से लोकप्रिय हुए खरे ने 225 से अधिक भोजपुरी फिल्मों में काम किया। उन्हें भोजपुरी फिल्मों का अमरीश पुरी भी कहा जाता है। भोजपुरी फिल्मों में खलनायक बनने की अपनी यादें ताजा करते हुए कहा कि जब ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ फिल्म बनी तो प्रोड्यूसर ने उन्हें खलनायक के तौर पर चुना। लेकिन, फिल्म के डायरेक्टर प्रोड्यूसर के निर्णय से सहमत नहीं थे। अंतत: उन्हें एक मौका मिला और संयगोवश पहला ही शॉट शानदार रहा। एक बार में शॉट ओके हुआ और फिल्मों में उनका सफर शुरू हुआ।