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मोह को मैत्री में बदलना ही सामायिक

मुनि ने कहा कि आत्मा के निकट पहुंचने के लिए सामायिक से बेहतर कुछ नहीं है

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मोह को मैत्री में बदलना ही सामायिक

बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोड़वाड़ भवन में उपाध्याय रविन्द्र मुनि की निश्रा में रमणीक मुनि ने कहा कि जो जीवन की सत्यता को जान लेता है, जीवन के अनुभव को स्वीकार कर लेता है- ऐसे व्यक्ति की चलते-फिरते ही सामायिक हो जाती है।
वह किसी गलतफहमी का शिकार नहीं हो सकता। उसका मोह कमजोर पड़ जाता है।

जितना मोह कमजोर होगा उतना ही वह आत्मा के निकट होता है। मुनि ने कहा कि आत्मा के निकट पहुंचने के लिए सामायिक से बेहतर कुछ नहीं है। मोह को मैत्री में बदलना ही सामायिक है जो कि बहुत बड़ा उपक्रम है। यह मन ही है जो इंसान को भटकाता है। महावीर की वाणी में मन की चालाकी का इलाज है। मोह में स्वार्थ है, मैत्री में परमार्थ है। धर्म और संप्रदाय में वही अंतर है जो शरीर और आत्मा में है।

संप्रदाय होना बुरी बात नहीं है, लेकिन उसमें आत्मा होनी चाहिए। दिमाग पर होने वाले किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को रोकने के लिए प्रतिक्रमण सरीखी धार्मिक क्रिया की जाती है। संघ महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने बताया कि पुणे, जयपुर, देहरादून व पंजाब के विभिन्न शहरों से आए श्रद्धालुओं ने संतवृंदों के दर्शन किए। दोपहर के सत्र में सामायिक से संबंधित कक्षा में विभिन्न भ्रांतियों को मिटाया। रात्रि सत्र में सामूहिक रूप से चौमुखी जाप जारी है।


चारों आचार्यों का जयकारा लगवाया
प्रारंभ में रमणीक मुनि ने जैन धर्म के चारों संप्रदायों के आचार्यों का जयकारा लगवाया व गीतिका गुनगुनाई। इससे पूर्व मुनिवृंद ने गीतिका प्रस्तुत की। मांगलिक उपाध्याय रविन्द्र मुनि ने प्रदान की। संघ के अध्यक्ष ज्ञानचंद बाफना ने बताया कि सभा में चातुर्मास के मुख्य संयोजक रणजीतमल कानूंगा, इंद्रचंद सिंघी, शांतिलाल मकाणा, जैन कॉन्फ्रेंस के राष्ट्रीय मंत्री आनंद कोठारी, राजेंद्र कोठारी, प्रज्ञा संघ के अध्यक्ष जयसिंह भीलवाडिय़ा सहित अन्य संघों के पदाधिकारी व श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे।

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