
आध्यात्मिक साधना परम लक्ष्य का मार्ग- आचार्य देवेंदसागर
बेंगलूरु. जयनगर के राजस्थान जैन संघ में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि सर्वोच्च सत्ता की प्राप्ति के लिए व्यक्ति या तो ज्ञान के मार्ग से या कर्म के मार्ग से आगे बढ़ सकता है। उसी प्रकार भक्ति मार्ग से भी आगे बढ़ सकते हैं। तीक्ष्ण बुद्धि के साथ यह समझ आती है कि क्या स्थायी है और क्या अस्थायी है। इसके अलावा, किसी को यह विश्लेषण करना होगा कि स्थायी में से कौन सा सत्य है और कौन सा झूठ है। यह कई प्रकार के पत्थरों के साथ सोने के अयस्क के मिश्रण की तरह है। सबसे पहले अयस्क को गलाना और अलग करना होता है। इसी तरह सांसारिक मामलों में भी मनुष्य निराधार को हटाकर सारभूत को अपनाते हैं। वे केवल मलाई रखते हैं और स्थूल को अस्वीकार करते हैं। ठीक उसी तरह निरंतर बौद्धिक विश्लेषण से मनुष्य परम सत्य तक पहुंचते हैं। ज्ञान के साधक के लिए केवल यही ब्रह्म है। यही ज्ञान मार्ग है। कर्मयोग के अनुयायी केवल वही कर्म करते हैं जो उन्हें आध्यात्मिकता की ओर ले जाते हैं। कर्म के मार्ग पर चलते हुए यह अनुभव होता है कि जीवन में कुछ विकृति है और उसे अस्वीकार कर दिया जाता है। इसके बाद फिर से एक सही मार्ग अपनाया जाता है। यह प्रक्रिया यहीं नहीं रुकती। आगे चलते हुए यह पाया जाता है कि अब भी कुछ अशुद्धि है, जिसे फिर से खारिज कर दिया जाता है और एक शुद्ध मार्ग अपनाया जाता है। यह गतिशीलता तब तक जारी रहती है जब तक कि सर्वोच्च को प्राप्त नहीं कर लिया जाता।आचार्य श्री ने आगे कहा कि भक्ति मार्ग कहता है- सबको साथ लेकर, तुमने अपने आपको सबके बीच में छिपा रखा है और तू मेरा है। सब कुछ परमपुरुष की अभिव्यक्ति है। इसे ध्यान में रखकर भक्त सभी की एकीकृत दृष्टि से सेवा करते हैं और भक्ति मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। भक्तों का मार्ग सीधा है, प्रारंभ से ही आनंदमय है। ज्ञान का मार्ग थोड़ा कष्टदायक है और कर्म का मार्ग भी। कर्म ब्रह्मती कर्म बहू कुर्बित:। याद रखें पथ पर चलते समय यदि आपको पता चलता है कि कुछ कार्य जो स्वभाव से शुद्ध नहीं हैं और आपके लिए आनंद नहीं लाते हैं, तो आपको उन्हें पूरी तरह से अस्वीकार कर देना चाहिए। इसी तरह कदम दर कदम आगे बढऩा है। इसलिए आपको जितना हो सके काम को आगे बढ़ाना चाहिए। इस प्रकार कार्य की प्रक्रिया में आप समझ जाएंगे कि कौन सा कार्य नेक है, कौन सा कार्य नीच या प्रतिकारक है। इसलिए यह कहावत है- कर्म ब्रह्मती कर्म बहू कुर्विता:। यह कथन बहुत ही उचित है। ज्ञान का मार्ग कुछ और है।कर्म के सच्चे अनुयायी निश्चित रूप से आगे बढेंगे। आनंद मार्ग दर्शन में ज्ञान, कर्म और भक्ति तीनों का समन्वय है। वैसे भी किसी कर्म को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाए तो लक्ष्य तक पहुंचना अवश्यम्भावी है। ठीक उसी तरह आध्यात्मिक साधना भक्ति के साथ की जाए तो मनुष्य आसानी से परम लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
Published on:
03 Dec 2021 07:08 am
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