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मंदा है प्रचार सामग्री का व्यापार

न झंडा-बैनर,न लाउड स्पीकर लगता है हो ही नहीं रहा चुनाव प्रचार

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प्रियदर्शन शर्मा

बेंगलूरु. विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार शुरू हो चुका है लेकिन इसमें कोई रंगत नहीं है। यहां तक कि राजनीतिक दलों के झंडे, बैनर, पोस्टर, बिल्ले आदि भी कहीं नहीं दिखते। इसका कारण है कि चुनाव आयोग की सख्ती। चुनाव आयोग ने झंडे, बैनर लगाने या लाउड स्पीकर उपयोग को लेकर सख्त दिशा-निर्देश जारी कर रखे हैं, परिणाम स्वरूप राजनीतिक दल और उम्मीदवार फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। शहरी क्षेत्र में सोशल मीडिया के कारण मतदाताओं तक पहुंचने के तरीके में बदलाव से भी झंडे-पोस्टर के कारोबार पर असर पड़ा है।

करीब एक-डेढ़ दशक पूर्व शहर से लेकर गांव तक में हर राजनीतिक दल द्वारा गली-मोहल्लों को झंडे-बैनरों से पाट दिया जाता था। बेहद आसानी से यह पता चल जाता था कि चुनाव होने वाले हैं। यहां तक कि क्षेत्र में घूमने पर यह भी पता चल जाता था कि कौन किसका समर्थक है क्योंकि लोग उसी उम्मीदवार और पार्टी का झंडा या बैनर अपने घरों के बाहर लगाते थे जिसे वे चाहते थे। हालांकि अब ये बातें इतिहास बन चुकी हैं कि और झंडे-बैनरों को उपयोग करने में हर राजनीतिक दल, उम्मीदवार और समर्थक बेहद सतर्कता बरत रहे हैं।

निराशा : हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं व्यापारी और कारीगर
चुनाव आयोग की बंदिशों की सीधी मार झंडा-बैनर कारोबारियों पर पड़ी है। बेंगलूरु के सिटी मार्केट इलाके में दर्जनों दुकानदार झंडा-बैनर के व्यवसाय से जुड़े हैं। वेंकटपति नामक एक दुकानदार पिछले करीब चार दशक से इस व्यापार से जुड़े हैं। वे कहते हैं, जिस तरह से राजनीतिक दलों को पांच साल तक चुनाव का इंतजार रहता है उसी तरह हमें भी चुनाव का बेसब्री से इंतजार रहता है। पहले चुनाव की घोषणा होने के पूर्व से ही झंडे, बैनर, बिल्ले, अंग वस्त्र आदि की मांग बढ जाती थी न सिर्फ राजनीतिक दल और उम्मीदवार बल्कि उनके समर्थक भी ऑर्डर देते थे लेकिन अब सब कुछ बदल गया। वे कहते हैं कि इस बार चुनाव की घोषणा होने के बाद अब तक झंडों की कोई मांग नहीं है। अगर दो दशक से पूर्व से तुलना करें तो झंडे-बैनरों की बिक्री १० प्रतिशत ही रह गई है। इसलिए अब सीधे तौर पर इस व्यापार से कोई नहीं जुडऩा चाहता बल्कि यह एक वैकल्पिक व्यापार बन चुका है।
एक अन्य दुकानदार तिम्मय्या भी पिछले कई दशकों से झंडे सिलवाने और बेचने के व्यापार में लगे हैं। तिम्मय्या कहते हैं कि राजनीतिक दलों के झंडों से ज्यादा तो तिरंगे झंडे गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर हर साल बिक जाते हैं। या फिर १ नवम्बर को कन्नड़ राज्योत्सव के दौरान हर साल वे हजारों झंडे बेच लेते हैं लेकिन राजनीतिक दलों के झंडों की मांग अब बेहद सीमित रह गई है। तौकीफ नामक एक कारीगर ने बताया कि पहले चुनावी समय में उन्हें फुरसत नहीं मिलती थी। झंडों की इतनी मांग रहती थी कि ग्राहकों को लौटाने के लिए मजबूर होना पड़ता था। तौकीफ ने बताया कि पहले राजनीतिक दल कई महीने पूर्व सीधे एडवांस में हजारों झंडे, बैनरों की बुकिंग करा देते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता और गिनती के झंडे, बैनर बिकते हैं। इस बार अब तक उम्मीदवारों ने उनसे सम्पर्क नहीं किया है। हालंाकि दुकानदारों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि उम्मीदवारों की घोषणा होने के बाद झंडे-बैनरों की मांग बढेगी, बावजूद इसके इसमें मामूली वृद्धि होगी।