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कन्नड़ में इंजीनियरिंग की पढ़ाई का भविष्य अधर में

पुस्तकों की कमी छात्रों को कन्नड़ माध्यम से इंजीनियरिंग करने से हतोत्साहित करती है। सरकार को अनुवाद और तकनीकी प्रकाशनों के लिए धन बढ़ाना चाहिए।

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-लगातार छठे वर्ष नहीं मिला एक भी विद्यार्थी

-तमिलनाडु में आरक्षण के कारण यह पहल बेहद सफल, टॉप रैंकर्स हुए आकर्षित

कर्नाटक Karnataka में कन्नड़ माध्यम से संचालित इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों का भविष्य अधर में है। हाल ही में मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के लिए स्नातक इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया समाप्त हुई, लेकिन इस वर्ष किसी ने आवेदन नहीं किया। पिछले छह वर्षों से यही स्थिति बनी हुई है।

कई बार छात्रों ने सीटें चुनीं, लेकिन बाद में कॉलेज नहीं पहुंचे। दूसरी ओर पड़ोसी राज्य तमिलनाडु Tamil Nadu में वर्ष 2010 में पायलट आधार पर शुरू की गई यह पहल बेहद सफल रही है। टॉप रैंकर्स क्षेत्रीय भाषा में इंजीनियरिंग कर रहे हैं। अन्ना विश्वविद्यालय सिविल इंजीनियरिंग (तमिल माध्यम) की सीटें 30 से बढ़ाकर 60 करने पर विचार कर रहा है।

शिक्षाविदों के अनुसार, तमिलनाडु में यह मॉडल इसलिए सफल हुआ क्योंकि वहां क्षेत्रीय भाषा में पढ़ने वालों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता है। कर्नाटक में ऐसी कोई प्रोत्साहन नीति नहीं है। छात्र कन्नड़ माध्यम में इंजीनियरिंग Engineering in Kannada medium नहीं चुनते हैं। यहां भी आरक्षण मिले तो शायद कुछ बात बने।

ऐसे हुई शुरुआत

विश्वेश्वरय्या प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (वीटीयू) के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य के उच्च शिक्षा विभाग ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनइपी) की सिफारिशों के आधार पर 2020-21 में कन्नड़ माध्यम से इंजीनियरिंग शिक्षा शुरू की थी। वीटीयू ने कन्नड़ माध्यम को केवल सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग शाखाओं तक सीमित रखा। एस. जे. सी. इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बीदर स्थित भीमन्ना खंड्रे ऑफ टेक्नोलॉजी और मैसूरु स्थित महाराजा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इस पहुल में शामिल हुए। सरकार ने हाल ही में एनइपी को राज्य में रद्द कर दिया है और राज्य शिक्षा नीति विशेषज्ञ समिति की समीक्षा में है।

ऐसे में वीटीयू VTU अधिकारियों का कहना है कि कन्नड़ माध्यम से इंजीनियरिंग जारी रखना अब व्यावहारिक नहीं है। वीटीयू इसे बंद करने पर विचार कर रहा है। हालांकि, अंतिम निर्णय सरकार का होगा।

अध्ययन सामग्री

सरकार कन्नड़ में कोई भी पाठ्यक्रम शुरू करने से पहले, उचित अध्ययन सामग्री सुनिश्चित की जानी चाहिए। पुस्तकों की कमी छात्रों को कन्नड़ माध्यम से इंजीनियरिंग करने से हतोत्साहित करती है। सरकार को अनुवाद और तकनीकी प्रकाशनों के लिए धन बढ़ाना चाहिए।

-पुरुषोत्तम बिलिमले, अध्यक्ष, कन्नड़ विकास प्राधिकरण

राज्यपाल गहलोत ने किया था विमोचन

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने इस वर्ष अप्रेल में राजभवन में आयोजित एक समारोह में इंजीनियरिंग और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए कन्नड़ में अनुवादित इंजीनियरिंग पुस्तकों के संग्रह का विमोचन किया था। उन्होंने कहा था कि स्थानीय भाषा में सीखने से बौद्धिक विकास, रचनात्मकता और बेहतर समझ को बढ़ावा मिलता है। जब शिक्षार्थी अपनी मातृभाषा में तकनीकी विषयों को समझते हैं, तो उनके द्वारा नवाचार करने और शोध में योगदान देने की संभावना अधिक होती है।

2020-21 : 17 छात्रों ने सीटें चुनीं, पर प्रवेश नहीं लिया।

2021-22 : 10 छात्रों ने विकल्प चुना, पर सभी ने प्रवेश की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई।

2022-23 : 30 छात्रों ने सीटें चुनीं, लेकिन इस बार भी किसी ने प्रवेश नहीं लिया।

2023-24 : 26 छात्रों ने विकल्प चुना, बाद में ‘गलती से चुना’ कहकर रद्द कर दिया।

2024-25 : एक छात्र ने न केवल विकल्प चुना, बल्कि कॉलेज भी पहुंचा, लेकिन अकेला छात्र होने सहित कोई समर्पित कन्नड़ संकाय उपलब्ध नहीं होने की वजह से बाद में उसे अंग्रेजी माध्यम में स्थानांतरित करना पड़ा।