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कोमल हृदय वाला ही कर सकता है मैत्री

वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोड़वाड़ भवन में उपाध्याय रविंद्र मुनि के सान्निध्य में रमणीक मुनि ने ‘मेरी भावना’ रचना की व्याख्या करते हुए कहा कि यह जीवन की मधुरता-शीतलता स्तोत्र है व आत्मीयता का स्पंदन है।

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कोमल हृदय वाला ही कर सकता है मैत्री

कोमल हृदय वाला ही कर सकता है मैत्री

बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, चिकपेट शाखा के तत्वावधान में गोड़वाड़ भवन में उपाध्याय रविंद्र मुनि के सान्निध्य में रमणीक मुनि ने ‘मेरी भावना’ रचना की व्याख्या करते हुए कहा कि यह जीवन की मधुरता-शीतलता स्तोत्र है व आत्मीयता का स्पंदन है।

प्रार्थना और भावना के माध्यम से अनंत अरिहंत भगवंतों से आत्मा का आलंबन है। ‘मेरी भावना’ के रचयिता ने अपने आराध्य की व साहित्य की साधना करते हुए अपार भक्ति का परिचय दिया है। इस ग्रंथ की वाणी को दिल लगाकर, एकाग्रता से श्रवण करना चाहिए। एकाग्रता भी अहोभाव होने पर ही आती है। साथ ही, आत्मा का जिज्ञासु व परमात्मा का पिपासु ही इस एकाग्रता को प्राप्त कर सकता है।

आत्म ज्ञान व धर्म का प्रारंभ मैत्री भाव से हुआ है। जीने का आचार प्रतिबिंब है विचार। विचार छुपा होता है जबकि आचार प्रकट होता है। मैत्री, करुणा की साधना भी वही कर सकता है जिसका हृदय कोमल होता है। दुखी जीवों को देखकर व्यक्ति में संवेदना जागे, कंपन हो वह अनुकंपा यानी करुणा कहलाती है।


प्रारंभ में उपाध्याय रविंद्र मुनि ने मंगलाचरण किया। रमणीक मुनि ने ओंकार का सामूहिक उच्चारण कराया। ऋषि मुनि ने गीतिका सुनाई। पारस मुनि ने मांगलिक प्रदान की। कार्याध्यक्ष प्रकाशचंद बंब ने बताया कि सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। संचालन सह मंत्री सुरेशचंद मुथा ने किया।


शुद्ध आचार से आचरण भी शुद्ध
बेंगलूरु. हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुप्रिया ने कहा कि साधना से आत्मा शुद्ध होती है। साधना के लिए आहार, विचार और आचरण की शुद्धि महत्वपूर्ण है। जिसके आचार शुद्ध होंगे उसका आचरण भी शुद्ध होगा, उसके विचार भी शुद्ध होंगे। साधना के क्षेत्र में होने वाले चार प्रकार के मन पर विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि पहला है अज्ञान मन, जो मोह ममत्व रागादि भावों से वशीभूत रहता है।

दूसरा, मृतक मन यानी जिसमें इंसान हर समय उदास, बुझा बुझा सा रहता है, जिसमें भविष्य के प्रति निराशा के भाव घेरे रहते हैं। तीसरा, रोगी मन। जो हर समय दुख पीड़ाओं का ही अनुभव प्रकट करते हुए वेदना को समभाव से सहन नहीं करते हुए सिर्फ हाय-हाय करता रहता है। चौथा, स्वस्थ मन। जो सभी प्रकार की चिंता बाधाओं से मुक्त हर समय हंसमुख, प्रसन्न, खिला हुआ चेहरा वह व्यक्ति के स्वंस्थ मन वाला होना दर्शाता है। हम दान, शील, भाव, तप के साथ चौथे स्वस्थ मन वाले बनें जो हमारी साधना के लिए श्रेयस्कर है। साध्वी सुमित्रा ने मंगलपाठ प्रदान किया। संचालन संजय कुमार कचोलिया ने किया।