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मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं- आचार्य महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण ने शनिवार को के.जी.एफ. नगरी से प्रस्थान किया। कल तक जो भक्त अपने आराध्य के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए हुए थे। वही आज आराध्य को तृप्ति के भाव से विदाई देते नजर आए। आचार्य ने सेठिया परिवार के निवास स्थान से शनिवार सुबह प्रस्थान किया। करीब आठ किलोमीटर का विहार कर आचार्य अपनी धवल सेना के साथ के.जी.एफ. के बाहर भारत नगर स्थित जैन स्कूल पहुंचे। अधिकारियों, शिक्षकों व विद्यार्थियों ने आचार्य का भावभीना स्वागत किया। स्कूली बैंड के बीच पंक्तिबद्ध विद्यार्थी जयकारे लगा रहे थे।

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मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं- आचार्य महाश्रमण

जैन स्कूल में धर्मसभा
बेंगलूरु. जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण ने शनिवार को के.जी.एफ. नगरी से प्रस्थान किया। कल तक जो भक्त अपने आराध्य के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए हुए थे। वही आज आराध्य को तृप्ति के भाव से विदाई देते नजर आए। आचार्य ने सेठिया परिवार के निवास स्थान से शनिवार सुबह प्रस्थान किया। करीब आठ किलोमीटर का विहार कर आचार्य अपनी धवल सेना के साथ के.जी.एफ. के बाहर भारत नगर स्थित जैन स्कूल पहुंचे। अधिकारियों, शिक्षकों व विद्यार्थियों ने आचार्य का भावभीना स्वागत किया। स्कूली बैंड के बीच पंक्तिबद्ध विद्यार्थी जयकारे लगा रहे थे।

अंग्रेजी भाषा में विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए आचार्य ने अहिंसा यात्रा के संकल्प स्वीकार कराए। इसके बाद उपस्थित श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए आचार्य ने कहा कि मनुष्य जीवन आदमी को बहुत ही सौभाग्य से प्राप्त होता है। ऐसे दुर्लभ मानव जीवन का पूर्ण लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। एक कथानक के माध्यम से आचार्य ने मनुष्य तीन प्रकार बताते हुए कहा कि कुछ मनुष्य जो पाप का आचरण करने वाले होते हैं। हिंसा, हत्या, मारकाट, पंचेन्द्रिय वध, झूठ, माप-तौल में गड़बड़ी करते हैं। ऐसे मनुष्य नरक अथवा तिर्यंच गति में जाते हैं। अर्थात वे मनुष्य गति से भी नीच गति में चले जाते हैं। वे मनुष्य जन्म रूपी पूंजी को गंवा देते हैं।

दूसरे प्रकार के मनुष्य वे होते हैं जो न तो पाप करते हैं, न पुण्य करते हैं। धर्म भी नहीं करते और सरल होते हैं और सरल बने रहते हैं। वे पुन: मनुष्य गति को प्राप्त कर लेते हैं। अर्थात वे मनुष्य जीवन रूपी पूंजी को न घटाते हैं और न बढ़ाते हैं, बल्कि यथावत रखने वाले होते हैं।

तीसरे वे मनुष्य होते हैं, जिनका जीवन धर्म, साधना, परोपकार करना, धर्म करते हैं, सेवाभावी होते हैं, वे देवगति में चले जाते हैं अथवा मोक्ष का वरण भी कर सकते हैं। आदमी को अपने मानव जीवन रूपी पूंजी को और अधिक बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए और सत्कर्म करते रहने का प्रयास करना चाहिए। धर्म में समय लगाना मानव जीवन के लिए कल्याणकारी साबित हो सकता है। आचार्य ने जैन स्कूल में आगमन के संदर्भ में आशीष प्रदान की। मंगलचंद बांठिया व सोहनलाल बांठिया ने विचार व्यक्त किए। देवराज सोनी ने गीत का संगान किया। बालक श्रेष्ठ बांठिया ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी।