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वाणी ओर आचरण में सहयोग है वहां शांति है-आचार्य देवेन्द्रसागर

धर्मसभा

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वाणी ओर आचरण में सहयोग है वहां शांति है-आचार्य देवेन्द्रसागर

वाणी ओर आचरण में सहयोग है वहां शांति है-आचार्य देवेन्द्रसागर

बेंगलूरु. राजस्थान जैन संघ जयनगर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य देवेन्द्रसागर सूरी ने कहा कि जहां वाणी और आचरण में सहयोग है, वहां शांति है। दोनों के विलोम होते ही जीवन संघर्ष और टकराव का अखाड़ा बन जाता है। जैसे बांस के वृक्षों की आपस में टकराहट आग का कारण बन कर बड़े-बड़े सुरम्य वनों को भस्मीभूत कर देती है, वैसे ही कथनी और करनी का यह टकराव हमारे संपूर्ण व्यक्ïितत्व और हमारे सद्गुणों की सुरम्य वाटिका को नष्ट देता है। जिह्वा की आवाज मर्यादित और क्षणिक होती है जबकि जीवन की आवाज असीम और शाश्वत होती है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर जिह्वा से नहीं, जीवन से बोलते थे। इसलिए उनकी आवाज आज भी जीवित और प्रतिध्वनित है। भगवान महावीर की उक्ति है, जब तक जिह्वा और जीवन के बीच का फासला समाप्त नहीं होगा तब तक जीवन-वृक्ष पर सौंदर्य के फूल और सत्य के फल नहीं लग सकते हैं। अंत में मुनि महापद्मसागर ने कहा कि उपदेश भी वही सार्थक और प्रभावी होते हैं जिन्हें वाणी से नहीं अपने आचरण से प्रस्तुत किया जाता है। आचरण की भाषा बिना कुछ कहे सब कुठ का आभास करा देती है। बदलते परिवेश में हम अपने वाचिक ज्ञान को ही कृत-कृत्य मानकर संतोष पा रहे हैं। हमारी करनी, कथनी से कहीं बहुत पीछे रह गई है। जिह्वा पर राम नाम है लेकिन जीवन रावण के कारनामों का पर्याय बना हुआ है। हमारी इस दोहरी मनोवृत्ति ने जीवन को अनेक मान्यताओं और संस्कारों का अजायबघर बना दिया है। हम फूलों से लेकर उनकी खुशबू तक, व्यंजन से लेकर स्वाद तक और सजावट से लेकर रौनक तक में कृत्रिमता और ग्लैमर चाहने लगे हैं। इसलिए हमारे चारों तरफ असंयम का साम्राज्य है।

पैसे से भी अधिक पुण्य का बल है-साध्वी तत्वत्रया
बेंगलूरु. शंखेश्वर पाश्र्वनाथ जैन मंदिर राजाजीनगर में विराजित साध्वी तत्वत्रयाश्री व साध्वी गोयमरत्नाश्री ने कहा कि पैसे, पुण्य व परमात्मा में लोग पैसे को सर्वाधिक बलवान मानते हैं। पैसे वालों को देखकर उनके सुख का हर एक को आकर्षण रहता है। परंतु पैसा आने के बाद व्यक्ति सुखी हो जाएगा ऐसा कोई निश्चय नहीं है। पैसे से भी अधिक पुण्य का बल है। संसार की हर सामग्री में पुण्य का बल अधिक है। जिसे परमात्मा की प्राप्ति हुई उसे जगत में किसी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक मयान में दो तलवार नहीं रह सकती एक गुफा में दो शेर नहीं रह सकते। आकाश में दो सूर्य नहीं रह सकते। उसी प्रकार एक हृदय में संसार और परमात्मा साथ नहीं रह सकते। जब हृदय में संसार के सगे संबंधी, शरीर, दुकान, घर आदि की चिंता रहेगी तब तक ह्रदय में परमात्मा की प्रतिष्ठा नहीं होगी। इसके लिए संसार की चिंता को छोडऩा होगा। पैसे के साथ पुण्य, प्रतिष्ठा और प्रसन्नाता भी कमाना चाहिए। मनुष्य जीवन भर पैसा व संपत्ति के पीछे भागता रहता है। इसके चक्कर में वह परमात्मा को भी भूल जाता है, लेकिन परमात्मा कभी नहीं भूलते हैं।