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जनजातीय विरासत संग्रहालयों तक सीमित न रहे : राज्यपाल गहलोत

राज्यपाल गहलोत ने कहा, 700 से अधिक मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदायों के साथ भारत का सांस्कृतिक ताना-बाना भाषाओं, संगीत, नृत्य, मौखिक परंपराओं, सामाजिक संरचनाओं और जीवन शैली की एक विस्तृत श्रृंखला से समृद्ध है। ये न केवल संस्कृति की सुंदर अभिव्यक्तियां हैं, बल्कि प्राचीन ज्ञान और बुद्धि के वाहक भी हैं।

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-स्वाभिमान, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और संगठित प्रतिरोध के सच्चे प्रतीक थे बिरसा मुंडा

बेंगलूरु.

जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संग्रहालयों तक सीमित रखने के बजाय, उसे शिक्षा और सामाजिक विकास के केंद्र में लाना आवश्यक है। जनजातीय ज्ञान प्रणालियां केवल अतीत की स्मृतियां नहीं बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शक हैं।ये बातें राज्यपाल थावरचंद गहलोत Thawar Chand Gehlot ने कही। वे बुधवार को शहर के माउंट कार्मेल कॉलेज (स्वायत्त) में आयोजित जनजातीय संस्कृति, विरासत एवं पारंपरिक प्रथाएं विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

प्राचीन ज्ञान और बुद्धि के वाहक

राज्यपाल गहलोत ने कहा, 700 से अधिक मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदायों के साथ भारत का सांस्कृतिक ताना-बाना भाषाओं, संगीत, नृत्य, मौखिक परंपराओं, सामाजिक संरचनाओं और जीवन शैली की एक विस्तृत श्रृंखला से समृद्ध है। ये न केवल संस्कृति की सुंदर अभिव्यक्तियां हैं, बल्कि प्राचीन ज्ञान और बुद्धि के वाहक भी हैं।

आध्यात्मिक और सामाजिक क्रांति

उन्होंने कहा, बिरसा मुंडा स्वाभिमान, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और संगठित प्रतिरोध के सच्चे प्रतीक थे। उनके नेतृत्व में चलाया गया ‘उलगुलान’ आंदोलन न केवल एक स्वतंत्रता संग्राम था, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक क्रांति भी था। उन्होंने सांस्कृतिक स्वराज की वकालत की और भारत के आदिवासी समुदायों की परंपराओं, भाषाओं, आस्थाओं और जीवन शैली के संरक्षण के लिए संघर्ष किया।

प्रथा नहीं, संपूर्ण जीवनशैली

राज्यपाल गहलोत ने आदिवासी समाजों की पर्यावरण के प्रति जागरूक प्रथाओं को रेखांकित करते हुए कहा, हजारों वर्षों से, आदिवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रदर्शन किया है। उनके रीति-रिवाज, वन-आधारित कृषि और चक्रीय खेती से लेकर जैविक खाद और प्राकृतिक औषधि तक केवल प्रथाएं ही नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनशैली हैं।

माउंट कार्मेल कॉलेज (स्वायत्त) और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएसएसआर) के संयुक्त तत्वावधान में प्रायोजित जनजातीय गौरव संगोष्ठी योजना के तहत जनजातीय प्रतीक बिरसा मुंडा Birsa Munda की 150वीं जयंती समारोह के एक भाग के रूप में इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ।इस कार्यक्रम में आइसीएसएसआर के सदस्य सचिव प्रोफेसर धनंजय सिंह, बेंगलूरु विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जयकार शेट्टी, बेंगलूरु सिटी विश्वविद्यालय के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर के.आर. जलाजा, माउंट कार्मेल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन की सुपीरियर सिस्टर फ्रिडोलिन, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कोयल बिस्वास तथा शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और छात्रों ने भाग लिया।