
दो बार ब्रेन डेथ की पुष्टि पर वेंटिलेटर हटा सकेंगे अस्पताल !
बेंगलूरु. मरीज के ब्रेन डेड (दिमागी तौर पर मृत) प्रमाणित होने पर भी हृदय के धड़कते रहने तक मरीज को वेंटिलेटर पर रखा जाता आ रहा है। परिजनों के पीडि़त के अंगों को दान करने के निर्णय की स्थिति में ही वेंटिलेटर हटाने का चलन रहा है। इस अवस्था में ब्रेन डेड मरीज के अंग निकाले जाने तक उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा जाता है। लेकिन, अब अगर सरकार अंग प्रत्यारोपण प्राधिकरण के प्रस्ताव को अनुमोदित कर देती है तो स्थिति बदल सकती है। (karnataka hospitals may remove ventilator from brain dead comatose patients after double confirnation)
प्राधिकारण जीवसार्थकते की ओर से जारी एक एडवाइजरी के अनुसार ब्रेन डेड कोमाटोज मरीज के दो बार बे्रन डेड प्रमाणित होने के बाद वेंटिलेटर हटाया जा सकता है। परिवार ने अंगदान की सहमति नहीं दी हो तब भी। लेकिन परिवार को वेंटिलेटर हटाए जाने की जानकारी दी जानी चाहिए। हालांकि, यह महज एक एडवाइजरी है। सरकार ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। जुलाई में जारी इस एडवाइजरी से ज्यादातर अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सक भी अनभिज्ञ हैं।
जीवसार्थकते के संयोजक डॉ. किशोर पाडके ने बताया कि एक बार ब्रेन डेड (Brain Dead) प्रमाणित होने के छह घंटे बाद मरीज को फिर से जांचा जाता है। इस बार भी ब्रेन डेथ की पुष्टि होने के बाद ही पीडि़त को वेंटिलेटर से हटाया जा सकता है। उनके मुताबिक भारतीय राष्ट्रीय विधि स्कूल विश्वविद्यालय (एनएलएसआइयू) के विशेषज्ञों से विचार-विमर्श के बाद एडवाइजरी ड्राफ्ट की गई है। देश में ब्रेन डेथ को अंगदान (organ donation) से जोड़ कर देखा जाता रहा है। अब इन दोनों को एक-दूसरे से अलग किया गया है। ब्रेन डेथ होने और हृदय की धड़कन ुरुकने के बीच की संक्षिप्त अवधि में अंगों को निकालने की प्रक्रिया शुरू कर लेनी होती है।
डॉ. किशोर ने बताया कि ब्रेन डेथ के बाद हृदय की धड़कने थमने में कुछ घंटे या कई दिन भी लगते हैं। तब तक आइसीयू और वेंटिलेटर अन्य जरूरतमंद मरीजों के काम नहीं आ पाता है। मरीज के परिजनों पर भी भावनात्मक और आर्थिक बोझ बढ़ता जाता है। परिजन निर्णय नहीं ले पाते हैं कि वेंटिलेटर हटाना है या नहीं।
केरल सरकार ने भी इस वर्ष फरवरी में ऐसा ही निर्णय लिया। अच्छी तरह से परिभाषित नैदानिक प्रोटोकॉल के तहत मरीज के ब्रेन डेड प्रमाणित होने पर वेंटिलेटर हटाया जा सकता है। कुछ चिकित्सकों ने एडवाइजरी को सही ठहराया है। लेकिन इसे लेकर कानून बनाने की बात कही है। इससे परिजनों को समझाने में आसानी होगी और चिकित्सक भी बेफिक्र होकर काम कर सकेंगे। कानून के अभाव में मृतक के परिजन यह आरोप लगाते हुए केस कर सकते हैं कि उपचार जारी रहने की स्थिति में मरीज को बचाया जा सकता था। हालांकि, शहर के ज्यादातर चिकित्सकों का कहना है कि इस एडवाइजरी के संबंध में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।
कोमा व ब्रेन डेथ में अंतर
ब्रेन डेथ का अर्थ ब्रेन स्टेम के मृत होने से है। जब ब्रेन स्टेम डेड हो जाती है तो मरीज का अपने रेस्पिरेट्री फंक्शन (श्वसन क्रिया) पर नियंत्रण नहीं रहता है। यानी मरीज का सांस लेना, शारीरिक गतिविधि करना और प्रतिक्रिया देना बंद हो जाता है। मरीज को दर्द भी महसूस नहीं होता। कितनी भी शारीरिक तकलीफ देने पर वह कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है। कोमा में होने की स्थिति में मरीज के स्वस्थ होने की संभावना रहती है। लेकिन ब्रेन डेथ की स्थिति में ये संभावनाएं नहीं होती हैं। यानी कोमा के बाद वाली स्थिति ब्रेन डेथ होती है।
Published on:
01 Nov 2020 04:47 pm
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