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साक्षरता के मामले में कर्नाटक की महिलाएं पुरुषों से पीछे

लड़कियां अपनी मर्जी से स्कूल नहीं छोड़तीं, बल्कि दूरी, सामाजिक रीति-रिवाजों और सहयोग की कमी के कारण स्कूल छोड़ती हैं। इसका समाधान यह है कि गांवों के पास ज्यादा स्कूल बनाए जाएं, ज्यादा महिला शिक्षकों की नियुक्ति की जाए और लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए परिवारों और समुदायों को शामिल किया जाए।

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- 88.1 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 77.3 फीसदी महिलाएं ही साक्षर

साक्षरता Literacy के मामले में राज्य Karnataka की महिलाएं पुरुषों से पीछे हैं। हर 10 पुरुष जो पढ़ सकते हैं, उनमें से लगभग दो महिलाएं अभी भी नहीं पढ़ पातीं। नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (2023-24) के अनुसार, पुरुषों में साक्षरता दर 88.1 फीसदी है, जबकि महिला साक्षरता दर केवल 77.3 फीसदी है। राज्य में कुल साक्षरता दर 82.7 फीसदी है।

पड़ोसी राज्य बेहतर

तमिलनाडु और केरल जैसे पड़ोसी राज्यों ने बड़े पैमाने पर पुन: नामांकन पहल और राज्यव्यापी साक्षरता मिशनों के माध्यम से, लिंग और साक्षरता दोनों के संदर्भ में इस अंतर को पाटने में कामयाबी हासिल की है। कर्नाटक ने स्कूल छोडऩे वालों की दर को समझने के लिए डोर-टू-डोर सर्वेक्षण जैसे कार्यक्रम शुरू किए, लेकिन ये कार्यक्रम बिखरे हुए रहे और हर जिले तक समान तीव्रता से नहीं पहुंच पाए।

यादगीर और रायचूर में समस्या विकराल

स्कूलों और विशेष रूप से माध्यमिक स्कूलों की दूरी, विशेष रूप से प्राथमिक स्तर के बाद स्कूलों की संख्या में गिरावट और शिक्षकों की कमी आदि समस्याओं के कारण स्कूल छोडऩे वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। महिलाओं और पुरुषों के बीच साक्षरता दर प्रभावित हुई है। यादगीर और रायचूर जैसे क्षेत्रों में समस्या और विकराल है।

बोझ कम करने का भी दबाव

गरीबी से जूझ रहे परिवारों पर बच्चों को काम पर लगाने या घरेलू बोझ कम करने का भी दबाव रहता है। शिक्षकों का कहना है कि अशिक्षित माता-पिता, आर्थिक जरूरतें और घरेलू जिम्मेदारियों लड़कियों के स्कूल छोडऩे के आम कारण हैं। बेलगावी की एक सरकारी स्कूल शिक्षिका ने बताया कि मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की कमी और शर्मिंदगी के डर से भी लड़कियां स्कूल आने से कतराती हैं।

...तो छात्राएं ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगी

बाल अधिकार कार्यकर्ता वासुदेव शर्मा ने बताया कि प्राथमिक स्कूलों की कमी नहीं है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़ी कक्षाओं में जाते हैं, स्कूलों की संख्या घटती जाती है। यही बात कई लोगों, खासकर लड़कियों को हतोत्साहित करती है। प्राथमिक स्तर पर ज्यादा महिला शिक्षकों की नियुक्ति हो तो छात्राएं ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगी।

गांवों के पास हो स्कूल

उन्होंने बताया कि लड़कियां अपनी मर्जी से स्कूल नहीं छोड़तीं, बल्कि दूरी, सामाजिक रीति-रिवाजों और सहयोग की कमी के कारण स्कूल छोड़ती हैं। इसका समाधान यह है कि गांवों के पास ज्यादा स्कूल बनाए जाएं, ज्यादा महिला शिक्षकों की नियुक्ति की जाए और लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए परिवारों और समुदायों को शामिल किया जाए।