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विश्व प्रसिद्ध स्थल एएसआइ के आवश्यक दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर

इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने अब एएसआइ की ताजा पहल पर आश्चर्य जताया है

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विश्व प्रसिद्ध स्थल एएसआइ के आवश्यक दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर

बेंगलूरु. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने अपने एक चौंकाने वाले निर्णय में हम्पी को 98 आवश्यक दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है, जबकि हम्पी को यूनेस्को से विश्व धरोहर टैग के साथ वैश्विक मान्यता मिली हुई है। हम्पी की पहचान देश के प्रमुख पर्यटन गंतव्यों के रूप में है और सैंकड़ों वर्ष पुराने गौरवशाली इतिहास को संजोए अवशेषों को देखने के लिए हर वर्ष भारत सहित पूरी दुनिया से लाखों पर्यटक आते हैं। ऐसे में इसको आवश्यक दर्शनीय स्थलों की सूची से बाहर किए जाने से इतिहासकारों के साथ पर्यटन जगत भी अचंभित है।

एएसआई के अनुसार केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय ने कला एवं वास्तुकला, योजना एवं डिजाइन और इंजीनियरिंग कौशल एवं सभ्यता के अतीत को प्रतिबिंबित करने वाले देश के असाधारण स्मारकों और साइटों की सूची तैयार की है। 1986 में, यूनेस्को ने हम्पी स्मारकों को दृढ़ और भव्य के रूप में वर्णित करते हुए इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी। संस्कृति मंत्रालय ने पूरे मामले पर कहा है कि सूची वर्ष-2015 में तैयार की गई थी।

उनके अनुसार हम्पी को इसमें अनदेखा किया जा सकता है। हम्पी कभी मध्यकालीन हिंदू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था। तलिकोट्टा की लड़ाई के बाद, विजयी सल्तनतों के लिए असाधारण कला और स्थापत्य डिजाइन की सभ्यता वाले हम्पी शहर को लगातार कई महीनों तक नष्ट करने की कोशिश की बावजूद इसके आज तक हम्पी के अवशेष मौजूद हैं।

अब हम्पी को केवल खंडहरों के रूप में ही जाना जाता है। इस जगह पर तकरीबन 500 से ज्याादा खंडहर हैं, जो 25 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हुए हैं। हम्पी का वि_ल मंदिर शानदार स्मारकों में से एक है। इसके मुख्य हॉल में लगे 56 स्तंभों को थपथपाने पर उनमें से संगीत लहरियां निकलती हैं। इसके अलावा कमल महल और जनानखाना भी ऐसे आश्चर्यों में शामिल है। इसकी हर एक इमारत में रहस्य छिपा है जो अतीत के किस्से बयां करता है।

यही कारण है कि इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने अब एएसआइ की ताजा पहल पर आश्चर्य जताया है। न सिर्फ हम्पी बल्कि इस सूची में बिहार का नालंदा महाविहार खंडहर और राजस्थान के चित्तौडगढ़, कुंभलगढ़, सवाईमाधोपुर, झालावार, जयपुर और जैसलमेर के किले भी शामिल नहीं है जबकि इस प्रकार के 22 स्मारकों और स्थलों को यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर के रूप में मान्यता दे रखी है।