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एक्स ने कर्नाटक हाई कोर्ट में दी सरकार की कंटेंट ब्लॉकिंग प्रणाली को चुनौती

अमेरिकी अरबपति एलन मस्क के स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स कॉर्प ने हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें कथित सेंसरशिप पर चिंता जताई गई है।

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बेंगलूरु. अमेरिकी अरबपति एलन मस्क के स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स कॉर्प ने हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें कथित सेंसरशिप पर चिंता जताई गई है। अपनी याचिका में, एक्स ने 'सहयोग' पोर्टल की आलोचना की है, जो एजेंसियों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कंटेंट हटाने के आदेश भेजने वाला सरकारी प्लेटफॉर्म है।

उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह मामला 5 मार्च को दायर किया गया था और हाल ही में 17 मार्च को इसकी सुनवाई हुई। सुनवाई की अगली तारीख 27 मार्च तय की गई है। यह मामला न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना की एकल पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है।

मामले से अवगत लोगों केे मुताबिक पिछले महीने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ के संबंध में केंद्रीय रेल मंत्रालय से एक्स को कई बार आदेश मिलने के कारण यह मुद्दा गरमा गया। याचिका में भारत संघ, रेल मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा अन्य का उल्लेख है।

एक्स का तर्क है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए एकमात्र कानूनी प्रावधान है जो सरकार को ऑनलाइन सूचना तक पहुंच को अवरुद्ध करने की अनुमति देता है, और यह लिखित आदेश, सुनवाई और न्यायिक निगरानी सहित सख्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के साथ आता है।

हालांकि, कंपनी की दलील के अनुसार, सरकार कथित तौर पर इन सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना ही धारा 79(3) (बी) का इस्तेमाल कर ब्लॉकिंग आदेश जारी कर रही है, जिससे एक गैरकानूनी समानांतर व्यवस्था बन रही है।

एक्‍स ने आगे तर्क दिया कि सरकार की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। इसने आरोप लगाया कि कुछ ब्लॉकिंग आदेश धारा 69ए के तहत उचित प्रक्रिया का पालन करते हैं, जबकि धारा 79(3) (बी) के तहत जारी किए गए अन्य आदेश ऐसा नहीं करते, जिससे एक मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था बनती है।

इसके अलावा, अगर धारा 79(3) (बी) की व्याख्या बिना किसी सुरक्षा उपाय के कंटेंट ब्लॉकिंग की अनुमति देने के लिए की जाती है, तो यह अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत असंवैधानिक होगा, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है, इसने कहा।

बड़ी चिंता गृह मंत्रालय के सेंसरशिप पोर्टल का निर्माण

याचिका के अनुसार, यह ऑनलाइन पोर्टल कथित तौर पर विभिन्न सरकारी एजेंसियों और यहां तक ​​कि स्थानीय पुलिस अधिकारियों को धारा 69ए प्रक्रिया से गुजरे बिना ही ब्लॉकिंग आदेश जारी करने की अनुमति देता है। एक्स ने तर्क दिया कि इस तरह के पोर्टल के लिए कोई कानूनी आधार नहीं है और इसे अनधिकृत प्रणाली का अनुपालन करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

मस्क के नेतृत्व वाली कंपनी अदालत से यह घोषित करने के लिए कह रही है कि केवल धारा 69ए का उपयोग ही सामग्री हटाने के आदेश जारी करने का अधिकृत तरीका होना चाहिए।