
मृदुल पुरोहित. बांसवाड़ा. आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वालों की याद के साथ देशभक्ति की लेती हिलोर, गूंजते तराने, नाचते-गाते शहरवासी और तिरंगे के साथ विशाल जुलूस। कुछ एेसी ही थी आज से ठीक ७० वर्ष पहले १५ अगस्त, १९४७ की सुबह, जिसका गवाह शहर का आजाद चौक बना था। परतंत्रता की बेडि़यों से मुक्ति के बाद आजाद भारत की पहली सुबह क्या हुआ, कैसे हुआ, कौन सम्मिलित हुआ? आदि जिज्ञासाओं का शमन कर बुजुर्गों ने सुनाई आजादी के दिन की कहानी।
आजाद चौक में हुआ झंडारोहण
उन दिनों रोजाना आजादी के आंदोलन से जुड़े लोग, शहरवासी और स्कूली बच्चों के जुलूस निकालते थे। आजादी के लिए नारे लगाते कुछ लोगों को देखकर अन्य शहरवासी भी इसमें जुड़े। आजादी की पहली सुबह उत्साह से परिपूर्ण वातावरण था। शारदा कॉलोनी में निवासरत कमलाशंकर मेहता बताते हैं कि १५ अगस्त की सुबह भारत की आजादी की घोषणा की जानकारी मिलते ही स्वतंत्रता आंदोलन के अगुवा आजाद चौक में एकत्र हो गए। यहां छगनभाई पानवाले के यहां रेडियो हुआ करता था। रेडियो पर खबरें सुनने के साथ ही लोग नाचने-गाने लगे। ढोल बजने लगे। बाबा लक्ष्मणदास, भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, नानकराम नागर आदि के नेतृत्व में झंडा फहराया गया। आजादी मिलने की जानकारी मिलते ही आसपास के गांवों से भी लोग शहर पहुंचने लगे। इसके बाद शहर में विशाल जुलूस निकाला गया। महिलाओं ने भी जोरशोर से इसमें भागीदारी निभाई। आजादी की पहली सुबह भुलाए नहीं भूल पाते हैं।
निशुल्क फिल्म देखी थी
आजादी के आंदोलन की सफलता १५ अगस्त को मिली तो लोगों में अपार उत्साह था। प्रजामंडल की ओर से भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी, उनकी पत्नी शकुंतला बेन सहित अन्य लोगों की मौजूदगी में आजाद चौक और गोशाला में कार्यक्रम हुआ। १९३५ में जन्में और उस समय किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े नटवरलाल झा बताते हैं कि आजादी मिलने के बाद तत्कालीन रियासत व्यवस्था की लोगों को जानकारी नहीं थी। वे बताते हैं कि लोगों की जुबां से उन्होंने बार-बार महात्मा गांधी का नाम सुना। उस दिन शहर के बालकृष्ण टॉकीज में फिल्म का कोई पैसा नहीं लिया गया। उन्होंने भी अपने मित्रों के संग निशुल्क फिल्म देखी थी।
बचाई थी झंडे की आन
मैं उस समय करीब १६ साल का था। जैसे ही आजादी की घोषणा हुई, सुबह लोग आजाद चौक में एकत्र हो गए थे। लोग नाच रहे थे। कई लोग ढोल बजा रहे थे। बड़ी संख्या में मौजूद लोगों के बीच झंडारोहण किया गया। नागरवाड़ा निवासी और १९३१ में जन्मे शिवलाल त्रिवेदी ने अपनी स्मृतियों को पुन: ताजा करते हुए बताया कि उस दिन कुछ लोगों ने विरोध भी किया था, लेकिन शकुंतला बेन ने हिम्मत दिखाई और झंडे की आन बचाई थी। उत्तरदायी सरकार का गठन कर भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी को प्रधानमंत्री और मोहनलाल त्रिवेदी को शिक्षा मंत्री बनाया था।
बड़े-बुजुर्गों से सुना
मिशन कॉलोनी में निवासरत १९३५ में जन्मी जोश्विन जोश्वा कहती हैं कि आजादी मिलने के समय वह चौथी कक्षा में अध्ययनरत थी। पिता आर्मी में महू छावनी में थे और द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद १९४६ में बांसवाड़ा आ गए थे। आजादी मिलने के दिन बड़े-बुजुर्गों से सुना था कि देश आजाद हो गया। झंडा फहराया गया है। पाकिस्तान बना है और कई लोग वहां भी जा रहे हैं। उनका कहना था कि उस समय राजाओं का राज था। पहले शहर कोट था। शहर के बाहर जाने वाले रास्तों पर बड़े दरवाजे थे, जो सुबह छह बजे खुलते और रात नौ बजे बंद होते थे।
पटेल से की थी भेंट
नागरवाड़ा निवासी सुभाष त्रिवेदी ने बताया कि आजादी के बाद भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी और नानकराम त्रिवेदी दोनों सरदार वल्लभभाई पटेल से मिले थे। पटेल ने दोनों से बांसवाड़ा को गुजरात में सम्मिलित होने को कहा था, लेकिन उन्होंने राजस्थान में ही रहने की बात कही। इससे संबंधित दस्तावेज उनके पास सुरक्षित है।
Published on:
15 Aug 2017 02:04 am
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