
Banswara: Bad toilets are heavy on Government
सरकार ने राजकीय विद्यालयों में शौचालयों के निर्माण एवं रखरखाव पर भले ही करोड़ों का बजट फूंक दिया हो, लेकिन ज्यादातर का उपयोग गौण है। अफसरों की लचर मॉनिटरिंग एवं स्कूल प्रबंधन की लापरवाही से शौचालय कहीं खस्ताहाल हैं तो कहीं पर ताला लटका हुआ है।
इतना ही नहीं कई विद्यालयों में तो शौचालय पूरी तरह से खण्डहर में तब्दील से हो गए हैं। ऐसे में प्रतिमाह प्रति विद्यालय शौचालय रखरखाव के नाम पर मिल रहे 500 रुपए का बजट कहां व कैसे खर्च हो रहा है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
गौरतलब है कि जिले में तीन हजार से अधिक विद्यालय हैं, ऐसे में रखरखाव पर ही लाखों का बजट प्रतिवर्ष मंजूर हो रहा है।
यह है शौचालयों की सच्चाई
- राजकीय विद्यालय तेजपुर में शौचालय खस्ताहाल है जो उपयोग करने योग्य नही है। राजकीय विद्यालय पीपलोद में तो शौचालय के ही ठिकाने नहीं हैं, जिससे आए दिन विद्यार्थियों को परेशान होना पड़ता है।
- राबाउप्रावि गनोड़ा में 99 विद्यार्थियों का नामांकन है। यहां दो शौचालय में एक खण्डहर है तो दूसरा बंद है। यहां पानी की भी व्यवस्था नहीं है।
- राजकीय उमावि भीमपुर में 294 के नामांकन पर बालक-बालिकाओं के लिए अलग-अलग शौचालय तो है, लेकिन इनका उपयोग नहीं हो रहा है। शौचालय पर ताला लटका हुआ है। बालिका विद्यालय के हाल भी ठीक नहीं हैं।
- राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सुंदनी में शौचालय खण्डहर हो गए है। यहां नामांकन 600 का है। राजकीय प्राथमिक विद्यालय मछारापाड़ा में कचरे से अटे शौचालय हैं।
- राजकीय उमावि चंदुजी का गढ़ा, बालिका उप्रावि, राप्रावि चौतरा पाड़ा सहित ग्रामीण क्षेत्र के अधिकांश विद्यालयों में शौचालयों के उपयोग ही गौण हैं।
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