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बांसवाड़ा : कुशलकोट से गलियाकोट दरगाह की राह मुश्किल, जर्जर हो चुकी सडक़, संकेतक नहीं होने से भी भटक रहे जायरिन

बोहरा समुदाय के आस्था के केंद्र और विश्व प्रसिद्ध पीर फखरुद्दीन दरगाह तक पहुंच के लिए बांसवाड़ा जिले में कुशलकोट से गलियाकोट के बीच नदी पर पुल बनने के राह भले ही छोटी हो गई, लेकिन इस मार्ग पर कहीं भी मार्ग संकेतक बोर्ड नहीं होन से जायरीन को भटकना पड़ रहा है।

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बांसवाड़ा/परतापुर. बोहरा समुदाय के आस्था के केंद्र और विश्व प्रसिद्ध पीर फखरुद्दीन दरगाह तक पहुंच के लिए बांसवाड़ा जिले में कुशलकोट से गलियाकोट के बीच नदी पर पुल बनने के राह भले ही छोटी हो गई, लेकिन इस मार्ग पर कहीं भी मार्ग संकेतक बोर्ड नहीं होन से जायरीन को भटकना पड़ रहा है।

गलियाकोट में बोहरा समाज की विश्व प्रसिद्ध दरगाह एवं शीतला माता के प्राचीन मंदिर पहुंचने वाले लोगों को पहले सागवाड़ा होते हुए लंबी दूरी तय कर गलियाकोट जाना पड़ता था। गलियाकोट एवं कुशलकोट के बीच नदी पर पुल बनने से सीधी पहुंच आसान हो गई, वहीं दूरी भी घट गई। इसके चलते लोग इसी रास्ते से निकलने लगे, लेकिन यह मार्ग जर्जर होने से और मार्ग संकेतक बोर्ड नहीं होने से भटकाव बना हुआ है।

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इस मार्ग पर कुशलकोट से गलियाकोट मोड़ पर दो रास्ते मिलते हैं। एक मार्ग भानों का पारड़ा से कोटडा होकर दाहोद की ओर जाता है। दूसरा मार्ग मोटीबस्सी की ओर मुड़ता है। मार्ग संकेतक सूचना पट्ट नहीं होने से कई बार श्रद्धालु मोटी बस्सी से कुवालिया की ओर एवं चौहान माता मंदिर की ओर कच्चे रास्ते पर भटक जाते है। इसके अलावा कुशलकोट से आंजना के बीच मुख्य सडक़ क्षतिग्रस्त होने एवं सडक़ के दोनों ओर बबूल एवं झाडियों के कारण दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है। इसके मद्देनजर क्षेत्रवासियों ने आंजना से कुशलकोट पुल तक सडक़ पक्की कराने, संकेतक बोर्ड लगाने की मांग की है।

मोबाइल पर भी धोखा, बढ़ रही दिक्कतें

मोटी बस्सी के रूपशंकर उपाध्याय ने बताया कि गुजरात, मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में जायरिन गलियाकोट दरगाह पर इबादत के लिए निजी वाहनों से पहुंचते हैं। जायरीनों को आंजना, मोटी बस्सी, चौहानमाता मोटा महादेव मन्दिर मार्ग, कुशलकोट से होते हुए गलियाकोट मोड़ से गुजरना पड़ता है, लेकिन इन स्थानों पर कहीं भी सूचना पट्ट या संकेतक नहीं होने से वे मोबाइल जीपीएस के जरिए निकलते हैं। कई बार मोबाइल के आधार मार्ग देखकर चलने पर जायरिन मोटी बस्सी से कुवालिया चले जाते हैं और दूसरा रुट उनके लिए और भारी पड़ जाता है।