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जनता दल के बाद बीटीपी को मिली सफलता

बांसवाड़ा. प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक दल रहे हैँ। 101 का जादुई आंकड़ा पाने के लिए दोनों ही दलों में चुनावी संघर्ष रहा है। तीसरा मोर्चा प्रदेश में कुछ सीटें लाकर ताकत दिखाता रहा है, किंतु गत तीन दशक में वागड़ में तीसरे मोर्चे की दृष्टि से देखें तो जनता दल के बाद भारतीय ट्राइबल पार्टी ही दो या इससे अधिक सीटें किसी एक चुनाव में ला पाई हैं।

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राजस्थान का रण

राजस्थान विधानसभा चुनाव

बांसवाड़ा. प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस प्रमुख राजनीतिक दल रहे हैँ। 101 का जादुई आंकड़ा पाने के लिए दोनों ही दलों में चुनावी संघर्ष रहा है। तीसरा मोर्चा प्रदेश में कुछ सीटें लाकर ताकत दिखाता रहा है, किंतु गत तीन दशक में वागड़ में तीसरे मोर्चे की दृष्टि से देखें तो जनता दल के बाद भारतीय ट्राइबल पार्टी ही दो या इससे अधिक सीटें किसी एक चुनाव में ला पाई हैं।
वागड़ में बीते 30 वर्षों में 1993 से 2018 तक छह चुनाव की अवधि में बांसवाड़ा में जनता दल और बीटीपी ही ऐसे राजनीतिक दल रहे हैं, जिसके प्रतिनिधियों को जनता ने सदन में भेजा है। इसके अतिरिक्त अन्य सीटों से तीसरे मोर्चे के रूप में प्रतिनिधित्व किसी दल को नहीं मिल पाया है। चुनावी रणभेरी बजने के बाद अगले माह मतदान होना है। ऐसे में यह भविष्य के गर्भ में है कि भाजपा व कांग्रेस के अतिरिक्त कोई अन्य दल किसी सीट पर जीत हासिल कर पाता है या बीटीपी अपना करिश्मा दोहरा पाएगी।

बीटीपी ने चौंकाया
वर्ष 2013 के बाद जहां एक ओर बांसवाड़ा में जनता दल का वजूद समाप्त होता दिखा, वहीं 2018 में डूंगरपुर जिले में भारतीय ट्राइबल पार्टी ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। बीटीपी ने सागवाड़ा और चौरासी सीट पर अप्रत्याशित जीत दर्ज की, वहीं शेष सीटों पर भी अच्छे वोट हासिल करने में कामयाब रही। अब एक बार फिर बीटीपी चुनाव मैदान में हैं, जहां उसका मुकाबला भाजपा व कांग्रेस के अलावा बीएपी से है, जिसमें उससे अलग हुए कार्यकर्ता भी सम्मिलित हैं। अन्य दलों ने भी यहां चुनाव लड़ा, किंतु जीत नहीं पाए।
गिरता रहा ग्राफ
गत तीन दशक में बांसवाड़ा में जनता दल के सबसे अधिक तीन विधायक रहे। इसके 20 साल में जन समर्थन घटन के साथ विधायकों की संख्या भी शून्य हो गई। 1993 और 98 के चुनाव में जनता दल एकीकृत ने कुशलगढ़, बागीदौरा और दानपुर सीट से जीत दर्ज की। 2003 के चुनाव में दानपुर सीट खोनी पड़ी और दानपुर से पहली बार अर्जुनसिंह बामनिया ने यहां कांग्रेस का खाता खोला। जनता दल कुशलगढ़ व बागीदौरा में ही जीत सका। परिसीमन के बाद 2008 के चुनाव में बागीदौरा विधानसभा का कुछ क्षेत्र नवसृजित गढ़ी सीट में मिला और दानपुर सीट समाप्त होने के बाद इसका क्षेत्र बांसवाड़ा में जुड़ा। इसका खमियाजा जनता दल को बागीदौरा सीट खोकर भुगतना पड़ा। मात्र कुशलगढ़ सीट पर जनता दल जीत पाया। इसके बाद 2013 व 18 के चुनाव में जेडी को कोई सीट नहीं मिली। अब जिले में इसका वजूद खत्म सा है।


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