
रंगीले राजस्थान के इस क्षेत्र की महिलाओं में हैं एक समान ड्रेस पहनने का क्रेज, वजह जानकर आप भी हो जाएंगे इनके दीवाने
बांसवाड़ा. प्रदेश के दक्षिणांचल में अवस्थित, मध्यप्रदेश और गुजरात की संस्कृति का संयुक्त दिग्दर्शन कराने वाला वागड़ यानी आदिवासियों का गढ़। पहनावा, नाम, परम्पराएं और रीतिरिवाज और भी बहुत कुछ अजब-गजब और अनूठा है। चाहे कैसा भी मौसम हो, कड़ी मेहनत करने से भी यह कभी अपने कदम पीछे नहीं हटाते। श्रम के साधक के रूप में भी इन्हें पहचाना जाता है। ठेठ ग्रामीण अंदाज में पहाडिय़ों, बिखरी बस्तियों में निवासरत आदिवासी समाज में पुरुष के समान महिलाओं का भी दमखम देखते ही बनता है। समय के साथ अब आदिवासी समाज में भी बदलाव की बयार है। समाज की परम्पराओं और बदलाव को लेकर प्रस्तुत है विशेष श्रृंखला।
परिधान से एकता का संदेश
बांसवाड़ा. कुछ डिफरेंट चाहिए। ऐसा नहीं वैसा दो। किसी दूसरे के पास नहीं हो ऐसा यूनिक पीस दिखाओ। ड्रेस की खरीदारी के दौरान यह जुमले आम हो चले हैं, लेकिन आदिवासी एक रंग में रंगने से आज भी परहेज नहीं करते हैं। आदिवासी वर्ग अपनी वेशभूषा के लिए हमेशा से चर्चित रहा है। एक रंग के कपड़ों में सजना-संवरना इनकी खास पसंद है। यह सिर्फ शौकिया तौर पर नहीं, बल्कि संगठन व एकता का भी परिचायक है। कपड़ों की परम्परागत डिजाइन में बदलाव आया है और अब सिल्क के साथ ही पॉलिस्टर से भी घाघरा व ओढऩी युवतियां पसंद कर रही हैं।
समूह में खरीदारी
आदिवासी युवतियां परिधान क्रय करने के लिए इसकी प्लानिंग करती हैं। आठ से दस सहेलियां समूह में कपड़ा खरीदी से लेकर एक ही दुकान पर एक समान सिलाई करवाती हैं। त्योहार के अवसरों पर तो बाजार में एक ही रंग, डिजाइन के कपड़ों में सैकड़ों आदिवासी बालाएं दिखाई पड़ती हैं। एक समान ड्रेस इनके आपसी निकटता का भी द्योतक है। वहीं परिधानों के मामले में पुरुष भी पीछे नहीं हैं। सफेद रंग की धोती कुर्ता और आंखों पर काले चश्मे नवयुवकों की पहली पसंद होते हैं। इनकी परम्पराओं की दिग्दर्शन यहां लगने वाले धार्मिक और सामाजिक मेलों में सहज होते हैं। बेणेश्वर मेला हो या घोटिया आंबा का मेला, खरीदारी से लेकर झूलों में झूलने और गन्ने चूसने का लुत्फ लेते आदिवासी युवक और युवतियां बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं।
Published on:
20 May 2018 01:23 pm
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