दिनेश तंबोली. बांसवाड़ा. 13 साल की उम्र की रानू पर अपने तीन भाई-बहनों की परवरिश का जिम्मा। पिता का साया सिर से उठा, तो मां मजदूरी के लिए गुजरात गई। पीछे वही इन नन्हों की मां बनी हुई है। यह बानगी है जनजाति बहुल बांसवाड़ा जिले के लालाआड़ा गांव के मईड़ा परिवार की। यहां एक-दो नहीं, दर्जनों परिवार ऐसे हैं, जिनमें बच्चे ही बच्चों को पाल रहे हैं। इलाके में रोजी-रोटी का संकट विकास और प्रगति के दावों की बखिया उधेड़ता दिखलाई देता है। पत्रिका टीम ने जब आंबापुरा-कुशलगढ़ मार्ग से सटे लालाआड़ा पहुंचकर इन बच्चों के हाल देखे तो मालूम हुआ कि सुबह से रात तक घर, खेती, पशुओं की सारसंभाल के काम और बीच में पढ़ाई, बस यही इनकी दिनचर्या है।
पिछले दिनों गेहूं-मक्का की फसल कटाई के बाद गर्मी में खेतों में काम नहीं बचा और रोजगार का दूसरा कोई साधन नहीं मिला, तो रानू की मां जैसे कई परिवारों से माता-पिता गुजरात पलायन कर चुके हैं। पीछे इनके घर में जो भी बड़ा है, वही माता-पिता बनकर घर की जिम्मेदारियां निभा रहा है। रानू के घर पहुंचने पर वह तवे पर मक्का की रोटियां बनाकर छोटे भाई आकाश और बहनों रितिका और राधिका को खिलाती दिखीं। बातचीत में उसने बताया कि वह अभी आठवीं में पढ़ती है। पिता की मृत्यु हो चुकी है। मां गुजरात में काम के लिए गई हुई है। इसलिए भाई बहनों का जिम्मा उसी का है। मां को वहां जो मजदूरी मिलती है, हर माह बस चालक या कंडक्टर के हाथ भेज देती है। इसी से घर चलता है। भाई-बहन पहली, दूसरी एवं छठी में पढ़ रहे हैं।
सरकारी पेंशन भी नहीं
रानू कहती है कि 2016 में पिता की मृत्यु के बावजूद सरकार की पेंशन योजना का लाभ भी नहीं मिल रहा है। इसके अलावा भी अन्य योजनाओं व सुविधाओं की उसे जानकारी नही है। गौरतलब है कि कुशलगढ़, छोटी सरवन, छोटी सरवा, सज्जनगढ़, आनंदपुरी सहित कई क्षेत्रों से रोजगार के लिए बड़ी संख्या में परिवार गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के लिए पलायन करते हंै। माता-पिता के पलायन के बाद पीछे बच्चों की शिक्षा सहित अन्य इंतजाम के लिए विशेष हॉस्टलों का संचालन भी होता है, लेकिन इसकी भी जानकारी कई परिवारों तक नहीं है।
उषा की भी ऐसी ही है कहानी
इसके ही पड़ोस में रहने वाली उषा की भी कहानी कुछ ऐसी ही प्रतीत हुई। उसने बताया कि उसके अभिभावक मजदूरी के लिए दमन गए हुए हैं। इसलिए पीछे घर के साथ दूसरी में पढ़ रहे भाई मणिलाल को संभाल रही है।