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‘वेदों और मंत्रों के ज्ञान तक ही सीमित नहीं ‘गुरुकुल’ शिक्षा पद्धति’

सभी विषयों के शिक्षण की होती है व्यवस्था

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banswara

‘वेदों और मंत्रों के ज्ञान तक ही सीमित नहीं ‘गुरुकुल’ शिक्षा पद्धति’

बांसवाड़ा. वेदों का पठन-पाठन, मंत्रों का उच्चारण, आध्यात्म से जुड़ी शिक्षा तक सीमित नहीं है गुरुकुल शिक्षा पद्धति। लोगों को गुरुकुल शिक्षा पद्धति को लेकर भ्रांतियां हैं। लोगों का मानना है कि यहां वेदों, मंत्रों और आध्यात्म से जुड़ी शिक्षा ही विद्यार्थियों को दी जाती है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। गुरुकुल में विद्यार्थियों को आध्यात्म का ज्ञान तो दिया ही जाता है। साथ ही उन्हें विज्ञान से भी अवगत कराया जाता है। कई गुरुकुल तो ऐसे हैं, जहां पर अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं का ज्ञान भी दिया जाता है, ताकि विद्यार्थी आधुनिकता से भी तारतम्य बनाए रख सकें। अहमदाबाद में संचालित महर्षि याज्ञवल्क्य ज्ञान पीठ के प्रधानाचार्य राजनारायण दवे ने बताया कि गुरुकुल दो प्रकार के हैं। एक वैदिक गुरुकुल, जिसमें आध्यात्म और पठन-पाठन ज्ञान विद्यार्थियों को दिया जाता है। दूसरा मूल गुरुकुल है, जिसमें आध्यात्म के साथ ही विज्ञान और अन्य कलाओं का भी ज्ञान दिया जाता है।

नहीं है बाध्यता
वर्तमान में गुरुकुलों में विद्यार्थियों से फीस लेने का कोई प्रावधान नहीं है। पुरातन तर्ज पर ही शिक्षा दी जाती है। शिक्षण का औसतन समय 12 वर्ष का माना है। गुरुकुल में शिक्षा लेने के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं हैं। यदि कम उम्र यानी की बच्चों को शिक्षा दी जाए तो ज्ञान उनमें रम जाता है। बच्चों को गीली मिट्टी की उपमा दी गई है, जैसा चाहो वैसा बना लो।

करीब 1500 गुरुकुल
सापकोटा ने बताया कि वैसे तो देश में कई गुरुकुल संचालित हैं, लेकिन बड़े स्तर पर करीब 1500 गुरुकुलों का संचालन किया जा रहा है। इन्हें और भी सक्षम बनाने के जतन किए जा रहे हैं। कुछ कन्या गुरुकुल भी हैं। जहां सिर्फ कन्याओं को ही शिक्षा दी जाती है।

कई भ्रांतियां
सम्पूर्णानंद संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण विभाग के अध्यक्ष डॉ. ज्ञानेंद्र सापकोटा का कहना है कि लोगों में यह भ्रांति है कि गुरुकुल में पूजन-पाठ या अध्यापन कार्य ही कर सकते हैं, यहां ब्राह्मणों, क्षत्रिय या वैश्य को शिक्षा मिलती है। गुरुकुल में कोई भी शिक्षा ग्रहण कर सभी कलाओं में पारंगत हो सकता है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षण के साथ वास्तु, विज्ञान, कला सरीखे ढेरों आयाम हैं। जहां भविष्य बनाया जा सकता है।

चल रहे जतन
गुरुकुल से पढ़े हुए विद्यार्थियों को उनके भविष्य में किसी प्रकार की कोई दिक्कत न आए, वे आधुनिक दौर में पीछे न रहें। इसके जतन किए जा रहे हैं। हाल ही में उज्जैन में अंतरराष्ट्रीय गुरुकुल सम्मेलन में इन बिन्दुओं पर विशेष चर्चा की गई कि कैसे गुरुकुल शिक्षा पद्धति को आधुनिकता के समकक्ष बनाया जाए और गुरुकुलों में पढऩे वाले विद्यार्थियों को दिक्कत का सामना न करना पड़े। अन्य कई मुद्दों पर भी चर्चा की गई।

‘वेद भारतीय संस्कृति के गौरवमयी ग्रंथ’
बांसवाड़ा. ‘वेद हमारे प्राण हैं और भारतीय संस्कृति के गौरवमयी ग्रंथ हैं। वेद, उपनिषद व गीता जैसे ग्रंथों के प्रचार प्रसार व गुरु परम्परा को जीवित रखना आवश्यक है।’ यह विचार सूरजपोल स्थित बड़ा रामद्वारा में बड़ा रामद्वारा व वैदिक भारत के तत्वावधान में ऋग्वेद परायण के समापन पर शुक्रवार को रामस्नेही सम्प्रदाय मेड़ता पीठाधीश्वर रामकिशोर महाराज ने व्यक्त किए। संत रामप्रकाश महाराज ने कहा वागड़ की धरा पर वैदिक परम्परा की कार्यशाला होना वर्तमान समय की आवश्यकता है।

ज्ञानेन्द्र सापकोटा ने कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वैदिक परंपरा के माध्यम से लुप्त होती संस्कृति को पुनर्जागरण का कार्य किया जा रहा है। समारोह में वेदज्ञ इंद्रशंकर झा, हर्षद नागर, अभिजीत दिनकर सावले, मोहित भारद्वाज व अहमदाबाद के वेदाचार्य राजनारायण दवे, डा. दीपक द्विवेदी ने विचार व्यक्त किए। संचालन यशवन्त पंड्या ने किया। आभार सिद्धेश शर्मा ने व्यक्त किया। इस अवसर पर सूरजमल भावसार, राजीव जोशी, मुकेश भावसार, राजेश जोशी उपस्थित थे।


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