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#KhulkeKheloHoli : राजस्थान में यहां होली पर फिर से दूल्हा-दुल्हन बनते हैं नवजात के माता-पिता

होली की अनूठी परम्पराएं

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#KhulkeKheloHoli

बांसवाड़ा. होली। रंग की उमंग, चंग की थाप, गेर नृत्य की छटा तो हर जगह देखने को मिलती है, लेकिन इस पर्व पर इलाके विशेष में कुछ खास परंपराएं भी खूब प्रचलित हैं। जमाना काफी बदल गया है, लेकिन होली की इन परंपराओं का बखूबी निर्वहन आज भी हो रहा है। होली पर्व की ऐसी ही मान्यताओंं और परंपराओं के बारे में राजस्थान पत्रिका आपको रूबरू कराएगा।

ठीकरिया. यूं तो आपने देश में कई अनूठी परंपराओं के बारे में सुना होगा। लेकिन जिले के ठीकरिया गांव में होली के दौरान जो परंपरा अपनाई जाती है उसे सुन एक आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे। दरअसल, प्रत्येक वर्ष धुलेंडी की शाम को यहां शादी-शुदा लोगों को एक बार फिर शादी रचाई जाती है। पति-पत्नी का यह विवाह पूर्ण रीति रिवाज से किया जाता है। जिसमें गांव के साथ ही आसपास के लोग भी जुटते हैं।

पहली संतान के बाद होती है शादी
जिन युगल के पहली संतान हुई हो वे दूल्हा-दुल्हन के वेश में आते है। यहां से उनका बिनौला निकाला जाता है। ढोल-ढमाकों के साथ पूरे गांव में प्रदक्षिणा की जाती है। इसमें गांव की सभी महिलाएं मंगल गीत गाते हुए चलती है। चौराहे पर बुआ टीका की रस्म होती है। इसके बाद पारम्परिक लोक नृत्य होता है। यहां से विसर्जन के बाद गृह प्रवेश के दौरान घर की कुमारिकाएं द्वार रोकती है और उपहार मांगती है।

जिम्मेदारियों से कराते हैं रूबरू
गांव के हीरालाल भट्ट ने बताया कि इस अनूठी परम्परा के माध्यम से नवयुगल को गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों से रूबरू कराया जाता है। नवजात को विवाह योग्य बनाने के लिए आर्थिक रूप से समृद्ध बनने का संदेश भी मिलता है। व्यावहारिक तौर पर जीवन की प्रतिकूलताओं का मुकाबला करने का कौशल भी इसके द्वारा सिखाया जाता है।

जीवन जीने का कौशल सीखा
यह परंपरा बरसों से है।गांव की स्थापना और सामाजिक संरचना के गठन से होली के उत्साह को द्विगुणित करने यह परम्परा कायम की गई। बुजुर्गों से इसके माध्यम से जीवन जीने का कौशल सीखा।