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मानगढ़ बलिदान दिवस.. बांसवाड़ा : ताजा हुई सैकड़ों आदिवासियों की 1913 की शहादत, गूंजे पावन धाम और गोविंद गुरु के जयकारे

106 साल पहले आज ही के दिन सैकड़ों आदिवासियों के शहादत की गवाह बने बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम पर रविवार को पावन धाम और गोविंद गुरु के जयकारे गूंजे।

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बांसवाड़ा. 106 साल पहले आज ही के दिन सैकड़ों आदिवासियों के शहादत की गवाह बने बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम पर रविवार को पावन धाम और गोविंद गुरु के जयकारे गूंजे। देश का दूसरा जलियावाला बाग कहे जाने वाले राजस्थान व गुजरात की सीमा पर आनंदपुरी क्षेत्र की पहाड़ी पर बने मानगढ़ धाम पर श्रद्धांजलि सभा के जरिए गोविंद गुरु के अनुयायियों ने सैकड़ों आदिवासियों की शहादत को याद किया। बलिदान दिवस पर यहां सुबह से श्रद्धालुओं का देव दर्शन और धूणी पर सेवा-पाठ का सिलसिला चला।गौरतलब है कि 17 नवंबर 1913 को इस धाम पर गोविन्द गुरु के नेतृत्व में अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए करीब 1500 आदिवासी शहीद हुए थे। कहा जाता है कि यह घटनाक्रम जलियावाला बाग से भी बड़ा था। मानगढ़ से जुड़े अधिकृत दस्तावेज दिल्ली के अभिलेखागार से जुटाने के बाद विकास के मामले में सरकार ने प्रभावी कदम उठाए। वर्ष में एक बार ही आयोजन तक केंद्रित इस धाम को लेकर राजस्थान पत्रिका ने वर्ष 2015 में ‘आओ दिलाए मानगढ़ को मान’ अभियान चलाकर पहल की। तब शहादत के 102 वर्षों बाद पहली बार 15 अगस्त 2015 को यहां ध्वजारोहण कर शहीदों को नमन किया गया।जानिए गोविन्द गुरु को गोविन्द गुरु का जन्म 20 दिसंबर 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेड़सा) गांव में बंजारा परिवार में हुआ था। बचपन से सात्विक व आध्यात्मिक विचारों को आत्मसात कर चुके गोविंद गुरु ने 1903 में संप सभा नामक संगठन बनाया। इस संगठन के जरिए संप अर्थात मेल मिलाप से रहने, एकता स्थापित करने, व्यसनों, बुराइयों व कुप्रथाओं का परित्याग करने, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शिक्षा, सदाचार, सादगी, सहज-सरल जीवन अपनाने तथा अपराधों से दूर करने के लिए लोगों को जागृत किया गया। गोविन्द गुरु की अगुवाई में मानगढ़ धाम इसका केंद्र बना। गोविन्द गुरु का लक्ष्य देश की आजादी और व्यसनमुक्त, मेहनतकश समाज की स्थापना था। मानगढ़ नरसंहार के बाद गोविन्द गुरु को मृत्युदंड की सजा हुई, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदला। उनका निधन 30 अक्टूबर 1931 को गुजरात के कंबोई गांव में हुआ।ऐसे दी जाती है यहां श्रद्धांजलिबलिदान दिवस पर विशेष रूप से मानगढ़ धाम पर मुख्य धुणी पर पाठ, सेवा और दर्शन की गतिविधियों में अनुयायी शामिल होते हैं। यहां पांच ज्योतों को थाली में लेकर आरती के साथ भूरेटिया नी मानूं रे नी मानू… गीत गाते हुए शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है। इस दौरान गोविन्द गुरु के जीवन तथा मानगढ़ धाम शहादत के बारे में भी जानकारी देकर रात्रि में भजन-कीर्तन किए जाते हैं।