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आम और चीकू से लकदक बाग

—दादा की विरासत को संभाला वागड़ के गांव मेतवाला के युवा धीरेंद्रप्रताप सिंह ने पुरखों की विरासत में मिले छोटे से आम के बगीचे को लगन व मेहनत से फार्म हाउस में तब्दील कर दिया। इससे उन्हें आम, चीकू व आंवला सहित अन्य कई फल मिल रहे हैं। ।

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आम और चीकू से लकदक बाग

आम और चीकू से लकदक बाग

60 बीघा में फैला है बगीचा
यह बगीचा 60 बीघा में फैला है। इसमें आम की दशहरी, लंगडा, केसर, मल्लिका, तोतापुरी, आम्रपाली प्रजातियों के कुल 400 वृक्ष हैं। चीकू की लम्बी पत्ती व बॉल नाम की दो प्रजातियों के करीब 150 पेड़ हैं।

डेढ़ दशक की मेहनत का फल
पेशे से वकील धीरेंद्र का कहना है कि उनके दादा हडमतसिंह सिसोदिया ने छोटी सी शुरुआत की थी। उन्होंने मां के मार्गदर्शन में 10—15 वर्षों की मेहनत से आम व चीकू के पौधे लगाए। हर साल सौ नए पौधे लगाते हैंं।

चीकू व आंवला की भी बिक्री
मेतवाला को आम का हब कहा जाता है। यहां से कच्चे व पके आमों सहित चीकू व आंवला भी बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर सहित कई अन्य स्थानों से खरीदार आते हैं।

आय के साथ स्वास्थ्य लाभ
वर्ष में एक बार होने वाली इस फ लदार फसल से सालाना दो से तीन लाख रुपए की आय हो जाती है। प्रकृति व मूक पशु-पक्षियों की सेवा का मौका मिलता है। जानवरों के लिए सूड़ान घास भी लगाई है।

विनोद त्रिवेदी — पालोदा (बांसवाड़ा)