प्रदेश का आदिवासी अंचल बांसवाड़ा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां आदिवासी समाज में कई प्रथाएं हैं, जो आज भी सदियों पुरानी सामाजिक गतिविधियों को जीवंत रखे हुए हैं। ऐसी ही एक परंपरा है राई बुडिय़ा। इस परंपरा के तहत कुछ लोग गांव-गांव जाकर विभिन्न वेशभूषा में नृत्य करते हैं। गांवों में दशहरा के बाद से गांव से तकरीबन 12 से 15 लोग की टीम निकलती है। जो किसी गांव में जाकर नृत्य करती है। दशहरा से शुरू था सिलसिला दिवाली के बाद चतुर्दशी तक चलता है। धार्मिक आस्था से जुड़ी वाल्मीकि आश्रम बेणेश्वर धाम महंत फूलगिरी महाराज बताते हैं कि यह प्रथा वोर-वोरी के नाम से भी प्रचलित है। सदियों से लोग इसे मानते आ रहे हैं। आस्था के तहत लोग आज भी यह नृत्य कराने की मन्नत लेते हैं। मान्यता है कि उज्जैन जिले में जावरा के पास फर्रानाजी भैरव का स्थान है। वहां पर लोग वोर-वोरी की मन्नत लेते हैं। फणजी जहां ऐसे कई झुंड देखने को मिल जाते हैं। यह प्रथा पूर्णतया धार्मिक आस्था से जुड़ गई है। इससे लोक नृत्य को संबल मिलता है। इस दौरान जो भी अनाज एकत्र होता है उसे प्रसादी के रूप में वितरित करने का भी रिवाज है।
लोग लेते हैं मान्यता
व्याख्याता लाल सिंह मईड़ा बताते हैं कि राई बुडिय़ा नृत्य में पुरुष महिला का वेश धारण कर नृत्य करते हैं। उन्होंने बताया कि मनौती के तहत कुछ लोग राई बुडिय़ा को बुलाते हैं। इस दौरान उन्हें ग्रामीण अनाज एवं अन्य वस्तुएं देते हैं। राई-बुडिय़ा नृत्य चौदस तक चलता है। लोग मन्नत पूरी होने पवर राई बुडिय़ा नृत्य कराने की भी मन्नत लेते हैं। मन्नत पूरी होने पर संबंधित धाम पर राई बुडिय़ा टीम के साथ जाकर मन्नत छोड़ते हैं।