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कई प्रदेशों में डंका, लेकिन राजस्थान में ढीले पड़े ‘कडकऩाथ’

अनुकूल वातावरण के बाद भी इसके पालन में बेरूखी, सरकारी स्तर पर भी नहीं मिल रहा संबल

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banswara

कई प्रदेशों में डंका, लेकिन राजस्थान में ढीले पड़े ‘कडकऩाथ’

बांसवाडा. बांसवाड़ा की सीमा से सटे मध्यप्रदेश के झाबुआ और धार की आबोहवा मुर्गे की उन्नत नस्ल ‘कडकऩाथ’ को तो रास आ गई है, लेकिन ऐसे ही वातावरण के बावजूद बांसवाड़ा में मुर्गे की इस नस्ल के पालन को लेकर पशुपालकों और मुर्गीपालकों में रुचि नहीं है। कुछ वर्षों पहले इसके पालन को लेकर कवायद की गई, लेकिन सरकारी स्तर पर मुर्गीपालकों को प्रोत्साहन नहीं मिल पाया। एक बार पुन: वृहद कार्ययोजना बनाकर इस दिशा में काम किया जाए तो जनजाति बहुल जिले के हजारों परिवारों को रोजगार का अतिरिक्त स्रोत मिल सकता है।

मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग ‘कडकऩाथ’ नस्ल के मुर्गा-मुर्गी का पालन करते हैं। सामान्य प्रजाति के मुर्गा-मुर्गी की अपेक्षा ‘कडकऩाथ’ महंगा है। इसका मांस हो गया अंडा, इसकी कीमत सामान्य मुर्गो से चार से पांच गुना अधिक होने से यह लाभकारी भी है। इसके चलते मध्यप्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में कई परिवार इसका व्यवसाय करते हैं।

खूब है मांग
कडकऩाथ मुर्गे की मांग मध्यप्रदेश के अलावा हैदराबाद, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में है। झाबुआ क्षेत्र में कई किसानों ने इसका पालन कर अपना आर्थिक स्तर काफी ऊंचा उठा लिया है, लेकिन सरहद से सटे होने के बावजूद बांसवाड़ा में इसका पालन व व्यवसाय करने वालों की संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है।

पालन में यह दिक्कतें
संयुक्त निदेशक पशुपालन डॉ. नेत्रपाल सिंह बताते है कि आदिवासी अंचल होने के कारण जिले में अधिकांश बैकयार्ड पोल्ट्री फॉर्म हैं। घरों में लोग स्वयं के लिए ही मुर्गियां पालते हैं। यह नस्ल तैयार होने में सामान्य नस्लों से दो गुना समय लेती है। जिसमेंअधिक व्यय होता है। इस नस्ल को सामान्य से अधिक जगह भी चाहिए होती है। व्यवस्थित फॉर्म में ही इनका पालन पोषण किया जा सकता है।

खून और मांस काला, अंडे भूरे
कडकऩाथ मुर्गा काले रंग का होता है। इसकी विशिष्टता मेडिकल साइंस को भी हैरत में डालती है। मुर्गे की यह नस्ल काली होती है। खून और मांस भी काले रंग का होता है। करीबन 10 वर्षों से कडकऩाथ का व्यवसाय करने वाले बहादुर सिंह बताते हैं कि कडकऩाथ के अंडे भूरे होते हैं। इसकी मूल नस्ल को बांसवाड़ा के वातावरण को देखते हुए पाला जाए तो यह काफी फलफूल सकता है और आय का स्थायी स्रोत बन सकता है।

कीमतें भी चार से पांच गुनी
कडकऩाथ मुर्गे का मांस और अंडा सामान्य नस्ल से चार से पांच गुना महंगा है। जहां देसी मुर्गियों के अंडे 15 से 20 रुपए में मिलते हैं, वहीं कडकऩाथ नस्ल की मुर्गी का अंडा 30 से 50 रुपए मे ंमिलता है। जिले में कुछ ही लोगों की ओर से इसका व्यवसाय करने के कारण यह सहज उपलब्ध नहीं हो पाता है।

उपेक्षा से सिमट गया प्रोजेक्ट
बांसवाड़ा में एक दशक पहले ‘कडकऩाथ’ के पालन को प्रोजेक्ट के रूप में लेकर कार्य किया गया। कुशलगढ़ व सज्जनगढ़ क्षेत्र में कुछ किसानों को तैयार किया गया। जिला परिषद की ओर से आवश्यक व्यवस्थाएं भी मुहैया कराई गई, लेकिन बाद में प्रशासनिक स्तर पर बरती उपेक्षा का परिणाम यह हुआ कि कडकऩाथ पालने वाले मुर्गीपालक और आदिवासी इससे दूर हो गए। साथ ही यह प्रोजेक्ट भी चंद महीनों में सिमट कर रह गया।


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