
बांसवाड़ा : हर मौसम के थपेड़ों से बचाते थे जो ‘थापड़े’, आधुनिकता की आंधी में डगमगाए बापड़े
बांसवाड़ा. आधुनिकता के इस दौर में जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव हो रहे है और इस बयार का असर वागड़ की कला, संस्कृति और हुनर पर भी देखने में आ रहा है। वागड़ की देसी थापड़े [कवेलू] बनाने की कला और परंपरा पर आधुनिकता का खूब बुरा असर हुआ है। आधुनिकता के दौर में सीमेंट कंकरीट की छतें अपने पैर पसार चुकी हैं तो देसी थापड़ों का प्रचलन भी कम हो गया है। या यूं कहें अपना वजूद कायम रख नहीं पा रहे हैं देसी थापड़े। देखने में तो मिट्टी के ये पतरे बेहद ही आम हैं। सदियों बाद भी इनका बाजारीकरण नहीं हुआ। शायद यही वजह है कि ये अब टिक नहीं पा रहे हैं। आज भी इन्हें कोई बेचता नहंीं है, बल्कि स्वयं के उपयोग के लिए ही बनाते हैं। सर्दी, गर्मी हो या बरसात हर मौसम में यह कवच के रूप में लोगों के साथ खड़े रहते हैं लेकिन इनकी खासियतों का भूल लोग पक्की छतों की तरफ झुक गए हैं। विलुप्त होते देशी थापड़ों को लेकर पेश है आशीष बाजपेई की रिपोर्ट -
देते हैं भाईचारे का संदेश
ग्रामीणों ने बताया कि देशी थापड़ों को कोई बनाकर बेचता नहीं है। चूंकि इन्हें बनाना एक कला है। इसलिए ग्रामीण इन्हें बेचते नहीं है। यदि किसी को आवश्यकता होती है तो सहयोगार्थ सभी मिलकर बनाते हैं ताकि जरूरतमंद का कार्य आसानी से हो जाए। चूंकि देशी थपेड़ों का बनाना और छतों पर लगाना एक जटिल प्रक्रिया है इसलिए इसे बनवाने में मिलजुलकर सहयोग करते हैं। ताकि घर बनाने में किसी को दिक्कत नहीं आए।
यह हैं देशी थापड़े, दो प्रकार के होते हैं
दरअसल, मिट्टी के इन कवेलू को स्थानीय भाषा में देशी थापड़े कहते हैं। इसके नाम को लेकर ग्रामीणों ने बताया कि यह पूर्णतया हाथ से कंडों की तरह ही थाप कर बनाया जाता है। इस कारण ही इन्हें थापड़े कहा जाता है। आमतौर पर दो प्रकार के कवेलू का उपयोग झोंपड़ों की छतें बनाने में किया जाता है। इनमें से एक देशी थापड़े हैं और दूसरे को इंग्लिश कवेलू कहा जाता है। जिन्हें ग्रामीण प्राय: गुजरात से मंगवाते हैं, जिनकी कीमत 8 से 10 रुपए पड़ती है।
इसलिए बेहतर है देशी थापड़े
छात्रसालपुर निवासी ग्रामीण बिटल ने बताया कि ये थापड़े तीनों मौसम में बेहतर परिणाम देते हैं गर्मी, बारिश और सर्दी किसी भी मौसम का असर घर के अंदर नहीं होता। गर्मी के दिनों में जिन घरों में थापड़े लगे होते हैं वे भीतर से ठंडे रहते हैं। बारिश के दिनों में पानी भी अंदर प्रवेश नहीं करता। वहीं, सर्दी के दिनों में बाहर की ठंडक घर में प्रवेश नहीं कर पाती है। जिससे घर के अंदर ठंड का एहसास नहीं होता। दरअसल ये पूर्णतया मिट्टी के बने होते हैं और इन्हें दोहरी पर्त में लगाया जाता है। जिस कारण इन पर मौसम का असर नहीं होता। जबकि इंग्लिश कवेलू कुछ वर्षों में ही दम तोडऩे लगते हैं। छत पर लगे लगे ही दूटने लगते हैं और गर्मी के दिनों में घरों का ठंडा भी नहीं रख पाते।
50 वर्षों से भी ज्यादा चलते है
ंबुजुर्ग रूपा और प्रौढ़ बिटल ने बताया कि देशी थापड़ों की उम्र काफी ज्यादा होती है। ये 50 वर्षों से अधिक समय तक चलते हैं। उनके घरों में उनके दादा के द्वारा थापड़े बनाकर लगाए गए थे जो अभी तक सही सलामत हैं।
8 से 10 दिन का समय लगता है बनाने में
भीमसिंह चरपोटा का कहना है कि देशी थापड़ों को बनाने में आठ से दस दिन का समय लगता है। इमसें खेत की मिट्टी और तालाब की मिट्टी का बराबर मात्रा में उपयोग किया जाता है। पहले तीन से चार दिन मिट्टी को पानी में डालकर रखते हैं, उसे बाद पैरों से कई घंटों कुचलकर चिकना करते हैं और एक-एक कंकड़ को मिट्टी से अलग करते हैं। ताकि सूखने और पकने के बाद थापड़ों में दरार नहीं पड़े। फिर उन्हें हाथों से कंडों की तरह थाप कर आकार दिया जाता है और सूखने के लिए धूप में रख दिया जाता है। सूखने के बाद उन्हें पूरी रात आग में पकाया जाता है।
Published on:
19 Jul 2018 02:48 pm
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